For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

ग़ज़ल नूर की- किसे गुरेज़ जो दो-चार झूठ बोले है,

१२१२/११२२/१२१२/२२ (११२)
.
किसे गुरेज़ जो दो-चार झूठ बोले है,
मगर वो शख्स लगातार झूठ बोले है.
.
चली भी आ कि तुझे पार मैं लगा दूँगी, 
हमारी नाव से मँझधार झूठ बोले है.
.
सवाल-ए-वस्ल पे करना यूँ हर दफ़ा इन्कार 
ज़रूर मुझ से मेरा यार झूठ बोले है.
.
कहानी ख़ूब लिखी है ख़ुदा ने दुनिया की,
कि इस में जो भी है किरदार, झूठ बोले है. 
.
पटकना रूह का ज़िन्दान-ए-जिस्म में माथा,
बिख़रना तय है प् दीवार झूठ बोले है.   
.
निलेश "नूर"
मौलिक/ अप्रकाशित 

Views: 1179

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by नाथ सोनांचली on May 22, 2017 at 1:39pm
आद0भाई नीलेश जी सादर अभिवादन, एक और जीवंत कसावट से भरी उम्दा ग़ज़ल कही आपने,दाद के साथ मुबारक बाद क़बूलें, सादर
Comment by Gurpreet Singh jammu on May 22, 2017 at 10:13am
आदरणीय नीलेश जी आपका बहुत बहुत शुक्रिया ..इतनी अच्छी तरह समझाने के लिए ..
क्या"प्" को हर जगह "पर" के लघु रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है या किसी खास सूरत में ही...क्रुप्या ये भी बताइएगा सर जी
Comment by Manan Kumar singh on May 22, 2017 at 9:34am
जी सही है।
Comment by Nilesh Shevgaonkar on May 22, 2017 at 8:36am

शुक्रिया आ. मनन जी,

शाइरी इशारों में होती है,, चाँद तारे तोड़ लाने में भी असंगतता है लेकिन तोड़े जाते हैं..
सादर

Comment by Manan Kumar singh on May 22, 2017 at 8:18am

एक अच्छी गजल के लिए बधाइयाँ आदरणीय। हाँ, दूसरे शेर में     '......... पार मैं लगा दूँगी       ....... मझधार झूठ बोले हैं ।' की संगतता असहज प्रतीत होती है शायद । देखिएगा, सादर।  

Comment by Nilesh Shevgaonkar on May 21, 2017 at 10:20pm

शुक्रिया आ. गुरप्रीत जी...
गुरेज़ से आशय है   नफ़रत या घृणा या अस्वीकार का भाव ... उसी सन्दर्भ में शेर हुआ है कि...   एक दो झूठ तो सब बोलते हैं, वो अस्वीकार्य या घृणा योग्य नहीं    है ..
.
ज़िन्दान-ए-जिस्म... यानी जिस्म की क़ैद (ज़िन्दान -क़ैद) ....प् ..पर के लघु रूप में इस्तेमाल होते आया है ...
रूह  जिस्म की क़ैद में लगातार सर फोड़ रही है ...
शरीर की दीवार ढहना तय है लेकिन शरीर (दीवार).. फिटनेस, मेक-अप के बनाने झूठ बोलता है ..
सादर 

Comment by Gurpreet Singh jammu on May 21, 2017 at 9:31pm
नीलेश सर जी यह ग़ज़ल भी आपकी हर ग़ज़ल की तरह बहुत पसंद आई है. आपकी ग़ज़लों का अलग ही अंदाज़ है..एक नवीनता सी है.जो मुझे बहुत पसंद आती है
आखरी शैर मैं समझ नहीं पाया सर जी
"ज़िन्दान-ए-जिस्म" इस शब्द का अर्थ नहीं मालूम और इसमें एक शब्द "प्"है इसके बारे में भी जानना चाहूंगा सर जी
मतला बहुत ही खूबसूरत है सर जी ..लेकिन इस में गुरेज शब्द के इस्तेमाल के बारे में कुछ असमंजस में हूँ. गुरेज को आपने शायद आपत्ति के भाव में लिया है..और मुझे लगता है की इसका अर्थ कुछ और है जैसे इस वाक्य देखिए "भविष्य में ऐसी हरकतों से गुरेज किया जाए"
सर जी छात्र होने के नाते ये ज़रूरी है कि जो बानीलेश सर जी यह ग़ज़ल भी आपकी हर ग़ज़ल की तरह बहुत पसंद आई है. आपकी ग़ज़लों का अलग ही अंदाज़ है..एक नवीनता सी है.जो मुझे बहुत पसंद आती है
आखरी शैर मैं समझ नहीं पाया सर जी
"ज़िन्दान-ए-जिस्म" इस शब्द का अर्थ नहीं मालूम और इसमें एक शब्द "प्"है इसके बारे में भी जानना चाहूंगा सर जी
मतला बहुत ही खूबसूरत है सर जी ..लेकिन इस में गुरेज शब्द के इस्तेमाल के बारे में कुछ असमंजस में हूँ. गुरेज को आपने शायद आपत्ति के भाव में लिया है..और मुझे लगता है की इसका अर्थ कुछ और है जैसे इस वाक्य देखिए "भविष्य में ऐसी हरकतों से गुरेज किया जाए"
सर जी एक छात्र होने के नाते ये ज़रूरी है कि जो सवाल दिमाग में आए उसे क्लियर कर लिया जाए लेकिन ये डर भी बना रहता है कि कहीँ ऊट-पटांग और मूर्खतापूर्ण सवालों से शिक्षक बुरा ही न मान जाए
Comment by Nilesh Shevgaonkar on May 21, 2017 at 7:01pm

शुक्रिया आ तस्दीक़ अहमद साहब ..
शतुर्गुरबा क्यूँ है ? आप यदि मिसरेइक से पढेंगे तो आप को स्पष्ट होगा कि संवाद की सूरत है ..
सादर 

Comment by Nilesh Shevgaonkar on May 21, 2017 at 6:58pm

शुक्रिया आ. राम अवध जी 

Comment by Nilesh Shevgaonkar on May 21, 2017 at 6:57pm

शुक्रिया आ. गिरिराज जी 

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

Ashok Kumar Raktale posted a blog post

चौपाइयाँ

*दोहा*बरखा के बढ़ते क़दम, आये  हैं  अब पास।दूर नहीं है साजना, सुरभित सावन मास।।*चौपाई*वह फुहार वह साथ…See More
yesterday
Ashok Kumar Raktale commented on Ashok Kumar Raktale's blog post बरसात
"  आदरणीय चेतन प्रकाश साहब सादर नमस्कार, यही तो मुख्य है विषय है इस रचना का. नदी नहीं उफ़नाई है.…"
yesterday
Chetan Prakash commented on Ashok Kumar Raktale's blog post बरसात
"आदरणीय,  अशोक  रक्ताले साहब, नमस्कार  !  लेकिन  यह कैसी "रिमझिम…"
yesterday
Profile IconShyamsundar Chatterjee , Alamseti ajita kumar and Dr. Mohd Israr joined Open Books Online
yesterday
Ashok Kumar Raktale commented on Ashok Kumar Raktale's blog post बरसात
"आदरणीय सौरभ जी सादर प्रणाम, प्रस्तुत रचना की सारगर्भित समीक्षा कर आपने मेरे सृजन कार्य को सार्थकता…"
Saturday
Sushil Sarna commented on Sushil Sarna's blog post दोहा सप्तक. . . .मंच
"परम आदरणीय सौरभ जी सादर प्रणाम - सर सृजन के भावों को आत्मीय मान से अलंकृत करने का दिल से आभार…"
Friday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on धर्मेन्द्र कुमार सिंह's blog post रहना हो भारत में जिंदा, चुप रहिए (ग़ज़ल)
"वायव्य दशा के प्रस्तुतीकरण के क्रम में बना विश्वास प्रस्तुति की शाब्दिकता को स्थापित करता हुआ सफल…"
Friday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Sushil Sarna's blog post दोहा सप्तक. . . .मंच
"संसार का मंच एक गंभीर विषय है. तदनुरूप आपका प्रयास श्लाघनीय है, आदरणीय सुशील सरना जी.  कई…"
Friday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Ashok Kumar Raktale's blog post बरसात
"आदरणीय अशोक भाईजी, कितनी निष्कपट, कितनी भोली, कितनी सरस कविता हुई है ! जैसे, कोई अबोध बच्चा…"
Friday
Sushil Sarna commented on Sushil Sarna's blog post दोहा सप्तक. . . .मंच
"आदरणीय  अशोक रक्ताले जी सृजन के भावों को आत्मीय मान से अलंकृत करने का दिल से आभार आदरणीय…"
Jul 9
Ashok Kumar Raktale commented on धर्मेन्द्र कुमार सिंह's blog post रहना हो भारत में जिंदा, चुप रहिए (ग़ज़ल)
"चुप रहिए...  वाह  क्या रदीफ़ है, इसे देखकर ही मैं हाज़िर हो गया.  रहना हो भारत में…"
Jul 5
Ashok Kumar Raktale commented on Sushil Sarna's blog post दोहा सप्तक. . . .मंच
"अभिनय करते मंच पर, माटी के किरदार ।जीवन की अनुभूतियाँ, करते वो साकार ।।.....सच है अभिनय जीवन की…"
Jul 5

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service