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विश्वास ....

क्या है विश्वास
क्या वो आभास
जिसे हम
केवल महसूस कर सकते हैं
और गुजार देते हैं ज़िंदगी
सिर्फ़ इस यकीन पर कि
एक दिन तो
उसे हम स्पर्श कर लेंगे
छू लेंगे एक छलांग में
आसमान को

या
वो है विश्वास
जिसे हम जानते हुई भी
कि वो
चाहे कितना भी
हमारी साँसों के करीब क्यूँ न हो
छोड़ देगा
हमारा साथ
निकल जाएगा चुपके से
हमारे क़दमों के नीचे से
जैसे
ज़मीन होने का
विश्वास

विश्वास और अविश्वास के मध्य
ये बात निश्चित है कि
जिस दिन
ये मैं
आभास में लुप्त हो
आसमान बन जाएगा
उस दिन
वो शाश्वत सत्य के
अंतर् में खो जाएगा
इक ज़मीन
आभास हो जाएगी
और
एक विश्वास
आसमान हो जाएगा

सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

Views: 394

Comment

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Comment by Sushil Sarna on May 23, 2017 at 9:22pm
Aadrneey sir aapkeé sujhaavatmak prashansa avm pratikriya ka shukriya Sir aapka kathan bilkul sahee hai Kal ye prastuti apne sanshodhit roop men preshit karoonga Is amulay sujhaav ka shukriya

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on May 23, 2017 at 7:59pm

आदरनीय सुशील भाई , बात अच्छी कही है , बधाइयाँ । इस बार थोड़ी जल्द बाजी हो गयी लगता है , भाषायी कमियाँ अधिक हैं , विश्वास पुल्लिंग शब्द है ..  जहाँ आभासी होना चाहिये वहाँ आभास है ... एक बार ध्यान से और पढ़ लीजिये अपनी कविता .. ता कि आवश्यक सुधार हो सकें ।

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