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खुला ह्रदय का द्वार नहीं है

मापनी २२ २२ २२ २२ 

यदि करना इनकार नहीं है,

क्यों करता इकरार नहीं है

 

सच से रहता उसका झगड़ा,

झूठ  मुझे स्वीकार नहीं  है

 

शूल नहीं है प्रेम अगर, तो,

फूलों का भी हार नहीं है

 

दिल से कभी न कह पाओगे,

तुमको मुझसे प्यार नहीं है

 

क्यों जलता है तन मन इतना,

प्रेम अगर अंगार नहीं  है

 

लोकतंत्र है कहने को तो,

जनता की सरकार नहीं है.

 

प्रेम बयार बहेगी कैसे,

खुला ह्रदय का द्वार नहीं है.

मौलिक एवं अप्रकाशित 

 

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Comment by vijay nikore on June 3, 2017 at 3:13pm

अच्छी गज़ल के लिए हार्दिक बधाई।

Comment by बसंत कुमार शर्मा on June 3, 2017 at 1:21pm

आदरणीया KALPANA BHATT जी आपका दिल से शुक्रिया 

Comment by KALPANA BHATT ('रौनक़') on June 3, 2017 at 7:18am

बहुत बढ़िया ग़ज़ल हुई है आदरणीय बसंत कुमार जी | हार्दिक बधाई |

Comment by बसंत कुमार शर्मा on June 2, 2017 at 10:24am

आदरणीय Manan Kumar singh जी आपका ह्रदय से बहुत बहुत आभार 

Comment by Manan Kumar singh on June 2, 2017 at 10:08am
बहुत बढ़िया आदरणीय,बधाइयाँ
Comment by बसंत कुमार शर्मा on June 2, 2017 at 10:00am

आदरणीय Gurpreet singh जी आपकी हौसला अफजाई के लिए बहुत बहुत शुक्रिया 

Comment by Gurpreet Singh jammu on June 1, 2017 at 9:48am

बहुत बढ़िया आदरणीय बसंत कुमार जी ,,, आपकी ये पूरी ग़ज़ल बहुत पसंद आई 

Comment by बसंत कुमार शर्मा on May 31, 2017 at 9:07am

आदरणीय Mohammed Arif जी आपकी हौसला अफजाई  का बहुत बहुत शुक्रिया 

Comment by Mohammed Arif on May 30, 2017 at 9:06pm
आदरणीय बसंत कुमार शर्मा जी आदाब,छोटी बह्र की ब हुत बढ़िया ग़ज़ल । शे'र दर शे'र दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल करें ।
Comment by बसंत कुमार शर्मा on May 30, 2017 at 6:47pm

आदरणीय Shyam Narain Verma जी आपका ह्रदय से आभार 

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