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भाई बैरी से मिलके भाई को मार डाले |

२२     २२    २२    २२   २२   २२  २२ 
भाई  बैरी  से मिलके भाई को मार डाले |
जिस ने नाजों से पाला उसको ही जार डाले | 
अनबन गर कभी हो जाये बोले ना  भाई से     , 
जलता है दिल में  जैसे कोई अंगार डाले | 
बहकावे में आकर  भूला देता  है जब नाता  ,
देखे ना कोई खाई फंदा  खूंखार  डाले |
माने ना  किसी का समझाये जाकर जो कोई  , 
बन कर  खंजर  भाई के सीने पे धार  डाले |
बैरी  लगते भाभी बच्चे जब आखों चढ़ जायें , 
मानो रावण के वंसज  लंका  से रार  डाले |
बैरी सा दिखता भाई दिन रात  चुभता दिल में ,
घर को बनाता  जंगल सापों का हार  डाले |
अनमोल है जगत में भाई भाई का नाता , 
वर्मा कोई ना  ऐसे  भाई  पर वार डाले   |
 
श्याम नारायण वर्मा 
मौलिक व अप्रकाशित 
 

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Comment by रामबली गुप्ता on July 6, 2017 at 4:43pm
आद0 श्याम नारायण जी ग़ज़ल पर सार्थक प्रयास के लिये बधाई स्वीकारें। शिल्प और कथ्य दोनों को स्पष्ट करने के लिए आपको अभी काफी मेहनत करनी होगी। मात्रिक बहर में लय बहुत ही महत्वपूर्ण होता है।
Comment by नाथ सोनांचली on July 2, 2017 at 2:42pm
आद0 श्यामनारायण वर्मा जी सादर अभिवादन, गजल का सार्थक प्रयास पर बधाई स्वीकारें।
Comment by Samar kabeer on July 1, 2017 at 4:42pm
जनाब श्याम नारायण वर्मा जी आदाब,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा हुआ है,इसके लिये बधाई स्वीकार करें ।
ये मात्रिक बह्र है इसलिये इसको बह्र के मानक के साथ साथ लय का विशेष ध्यान रखने की आवश्यकता होती है,इसके अलावा शिल्प का भी ध्यान रखना आवश्यक है ।

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