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ग़ज़ल
1222 1222 1222 1222

जो लड़कर आँधियों से जीत का इनआम लेता है
ज़माना फ़ख्र से उसका युगों तक नाम लेता है

सहारा जो यहाँ हर डूबते इन्सां का बन जाये
खुदा भी हाथ उसका मुश्किलों में थाम लेता है

दुआओं की कमी होती नहीं उसको कभी यारों
बज़ुर्गों का यहाँ जो हाल सुबहो-शाम लेता है

पता सबको है मुश्किल की घड़ी होती बहुत छोटी
कहाँ हर आदमी हिम्मत से लेकिन काम लेता है

खुदा को भी शिकायत होगी शायद अपने बन्दे से
कि वो है खुदग़रज़ दुख में ही उसका नाम लेता है

उसे होती नहीं है रास्ते की मुश्किलों की फ़िक्र
पहुँचकर ही जो मंज़िल पर 'बली' आराम लेता है

-रामबली गुप्ता
मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by Mahendra Kumar on July 12, 2017 at 10:20pm

वाह-वाह आ. रामबली जी. मज़ा आ गया आपकी ग़ज़ल पढ़कर. बहुत ख़ूब! इस शानदार ग़ज़ल पर हार्दिक बधाई स्वीकार कीजिए. सादर.

Comment by Ravi Shukla on July 9, 2017 at 2:38pm
आदरणीय रामबली जी बहुत अच्छी ग़ज़ल आपने कही इसके लिए दिली मुबारकबाद कुबूल कीजिए
Comment by रामबली गुप्ता on July 8, 2017 at 10:16pm
हृदय से आभार आद0 भाई लक्ष्मण धामी जी
Comment by रामबली गुप्ता on July 8, 2017 at 10:15pm
हार्दिक आभार आदरणीया प्राची सिंह जी
Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on July 8, 2017 at 2:15pm
आ. भाई रामबली जी अच्छी गजल हुई है बधाई स्वीकारें ।

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on July 7, 2017 at 3:11pm

नही सर पे दुआओं की कमी होती उसे यारों,
यहाँ माँ बाप का जो हाल सुबहो शाम लेता है।......बहुत शानदार शेर 

अच्छी गज़ल कही है आ० रामबली गुप्ता जी 

बहुत बहुत बधाई 

Comment by vijay nikore on July 7, 2017 at 12:33pm

गज़ल अच्छी लगी। आपको बहुत बधाई देता हूँ।

Comment by रामबली गुप्ता on July 6, 2017 at 4:34pm
धन्यवाद आद0 रक्षिता जी
Comment by रामबली गुप्ता on July 6, 2017 at 4:34pm
सराहना के लिये आपका बहुत बहुत आभार आद0 सुशील सरना जी
Comment by रामबली गुप्ता on July 6, 2017 at 4:33pm
दिल से धन्यवाद आद0 सुरेन्द्रनाथ जी

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