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याद आता तब ख़ुदा जब आसरा कोई न हो

बह्र 2122 2122 2122 212

बे असर हों सब दुआएँ,और दवा कोई न हो
याद आता तब ख़ुदा जब आसरा कोई न हो ||

क्यूँ छुपाती हुस्न अपना हर घड़ी पर्दानशी
हुस्न वो किस काम का गर देखता कोई न हो ||

एक ख़्वाहिश है मेरी यारो ख़ुदा के फ़ज़्ल से
शैर इक ऐसा कहूँ, जैसा कहा कोई न हो ||

कौन आया है यहाँ पीकर,बता आब-ए-हयात
कौन सा घर है बता जिसमें मरा कोई न हो ||

दोष देना हो किसी को,देख लो ख़ुद आइना
ये भी तो सम्भव है कि तुमसे बुरा कोई न हो ||

दोष क़िस्मत का हमेशा ही नहीं होता मियाँ
कौन है जिसको यहाँ मौका मिला कोई न हो ||

दर्द सबका बाँट लें हमसब अगर मिलकर यहाँ
'नाथ' दावा है मेरा फिर गमज़दा कोई न हो ||

मौलिक व अप्रकाशित

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Comment by नाथ सोनांचली on July 12, 2017 at 10:15pm
आद0 महेंद्र जी सादर अभिवादन, आपके हौसला अफजाई के लिए कोटिश आभार
Comment by Mahendra Kumar on July 12, 2017 at 9:50pm

दोष देना हो किसी को,देख लो ख़ुद आइना
ये भी तो सम्भव है कि तुमसे बुरा कोई न हो ...वाह भाई सुरेन्द्र जी! यह शेर पढ़कर मज़ा आ गया. दूसरे शेर को छोड़ दिया जाए तो पूरी ग़ज़ल बहुत उम्दा है. मेरी तरफ़ से दिल से बधाई स्वीकार कीजिए. सादर.


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on July 10, 2017 at 7:38am

आदरणीय सुरेन्द्र भाई , बेहतरीन गज़ल कही है आपने .. दिली बधाइयाँ स्वीकार करें

Comment by नाथ सोनांचली on July 9, 2017 at 7:37pm
आद0 रामबली जी सादर अभिवादन। गजल पर आपकी प्रतिक्रिया के लिए सादर आभार।
Comment by नाथ सोनांचली on July 9, 2017 at 7:36pm
आद0 सतविंदर जी सादर अभिवादन। गजल पर आपकी प्रतिक्रिया के लिए सादर आभार।
Comment by नाथ सोनांचली on July 9, 2017 at 7:36pm
आद0 सुशील सरना जी सादर अभिवादन। गजल पर आपकी प्रतिक्रिया के लिए सादर आभार।
Comment by नाथ सोनांचली on July 9, 2017 at 7:35pm
आद0 लक्मन धामी जी सादर अभिवादन। गजल पर आपकी प्रतिक्रिया के लिए सादर आभार।
Comment by रामबली गुप्ता on July 8, 2017 at 10:20pm
क्या जबर्दस्त ग़ज़ल हुई है भाई सुरेंद्र नाथ जी। दिल से बधाई स्वीकारें। सादर
Comment by रामबली गुप्ता on July 8, 2017 at 10:20pm
क्या जबर्दस्त ग़ज़ल हुई है भाई सुरेंद्र नाथ जी। दिल से बधाई स्वीकारें। सादर
Comment by Sushil Sarna on July 8, 2017 at 3:14pm

बे असर हों सब दुआएँ,और दवा कोई न हो
याद आता तब ख़ुदा जब आसरा कोई न हो ||

क्यूँ छुपाती हुस्न अपना हर घड़ी पर्दानशी
हुस्न वो किस काम का गर देखता कोई न हो ||

वाह वाह वाह आदरणीय सुरेन्दर जी .... मज़ा आ गया है आपके अशआर पढ़कर ... दिल से मुबारकबाद कबूल फरमाएं सर।

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