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दोहे-गुरु पूर्णिमा विशेष-रामबली गुप्ता

जग में बिन गुरु ज्ञान के, नर-पशु एक समान।
गुरु के शुचि सानिध्य में, बनता मूढ़ सुजान।।1।।

ज्ञान जगत का मूल है, संस्कृति का आधार।
किन्तु बिना गुरु ज्ञान कब, पाये यह संसार?2।।

निज गुरु पद में बैठ नित, खुद को लो यदि जान।
कलुष-भेद हिय-तम मिटे, हो शुचि तन-मन-प्रान।।3।।

ज्ञान ज्योति गुरु दीप सम, और तिमिर-अज्ञान।
अर्पित कर श्रम-स्नेह-घृत, बनते शिष्य सुजान।।4।।

नित गुरु-पद वंदन करें, इसमें चारो धाम।
गुरु को श्री-हरि-पार्थ भी, नत हो करें प्रणाम।।5।।

गुरु की बातें जो सुने, नित्य लगाकर ध्यान।
उसका बढ़ता निशि-दिवस, बुद्धि-ज्ञान-बल-मान।।6।।

शिष्य-हृदय यदि भूमि तो, गुरु श्रमशील किसान।
सींचे नित निज नेह से, बोए निर्मल ज्ञान।।7।।

-रामबली गुप्ता
मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by Samar kabeer on July 10, 2017 at 2:41pm
जनाब रामबली गुप्ता जी आदाब,गुरु पूर्णिमा के अवसर पर गुरु को समर्पित बहुत उम्दा दोहे रचे आपने,इस प्रस्तुति पर दिल से बधाई स्वीकार करें ।
Comment by सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' on July 10, 2017 at 1:58pm
आद0 रामबली जी सादर अभिवादन, गुरु महिमा को रेखांकित करती बेहतरीन दोहे बने हैं।बधाई स्वीकारिये, इस सृजन पर।
Comment by Shyam Narain Verma on July 10, 2017 at 12:12pm
बहुत सुन्दर दोहे आदरणीय  । हार्दिक बधाई आपको 
Comment by Mohammed Arif on July 10, 2017 at 10:37am
आदरणीय रामबली गुरु गरिमा को रेखांकित करते बेहतरीन दोहे । हार्दिक बधाई स्वीकार करें ।

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