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मापनी २२१२ २२१२ २२१२  

 

आ  तो सही  एक  बार मेरे गाँव में

अद्भुत अतिथि सत्कार मेरे गाँव में

 

हर वक्त  रहते  हैं खुले सबके लिए

सबके दिलों के  द्वार  मेरे  गाँव  में

 

तालाब  नदियाँ और पनघट की छटा

है  प्रीति  का  विस्तार  मेरे  गाँव  में

 

सम्मान  पूरा  है  बुजुर्गों   का  यहाँ

होते   नहीं  वे  भार  मेरे   गाँव  में

 

सब बाँटते मिल साथ में सुख और दुख   

हो  जीत  या  फिर  हार  मेरे गाँव में

"मौलिक एवं अप्रकाशित" 

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Comment by बसंत कुमार शर्मा on July 17, 2017 at 3:53pm

आदरणीय  Hari Prakash Dubey जी दिल से शुक्रिया आपकी हौसला अफजाई के लिए 

Comment by बसंत कुमार शर्मा on July 17, 2017 at 3:52pm

आदरणीय KALPANA BHATT जी दिल से शुक्रिया आपकी हौसला अफजाई के लिए 

Comment by बसंत कुमार शर्मा on July 17, 2017 at 3:52pm

आदरणीय narendrasinh chauhan  जी दिल से शुक्रिया आपकी हौसला अफजाई के लिए 

Comment by Hari Prakash Dubey on July 16, 2017 at 4:53pm

आदरणीय  बसंत कुमार शर्मा  जी  सुन्दर ग़ज़ल  है । हार्दिक बधाई आपको ! सादर 

Comment by KALPANA BHATT ('रौनक़') on July 16, 2017 at 3:49pm

बढ़िया ग़ज़ल कही है अपने आदरणीय | बधाई स्वीकारें |

Comment by narendrasinh chauhan on July 15, 2017 at 4:21pm

खुब  सुन्दर रचना 

Comment by बसंत कुमार शर्मा on July 13, 2017 at 10:08am

आदरणीय Mahendra Kumar जी दिल से शुक्रिया आपकी हौसला अफजाई के लिए 

Comment by बसंत कुमार शर्मा on July 13, 2017 at 10:08am

आदरणीय khursheed khairadi जी दिल से शुक्रिया आपकी हौसला अफजाई का 

Comment by बसंत कुमार शर्मा on July 13, 2017 at 10:07am

आदरणीय  laxman dhami जी दिल से शुक्रिया आपकी हौसला अफजाई के लिए 

Comment by बसंत कुमार शर्मा on July 13, 2017 at 10:07am

आदरणीय डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव जी हौसला अफजाई के लिए दिल से शुक्रिया आपका.

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