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तुलसी को वनवास हो हो गया

घर टूटे मिट गए वसेरे,

महलों में आवास हो गया.

ऊँचे कद को देख लग रहा,

सबका बहुत विकास हो गया.

भूल गए पहचान गाँव की,

बसे शहर में जब से आकर.

नहीं अलाव प्रेम के जलते,

सूनी है चौपाल यहाँ पर.

 

अधरों पर मुस्कान किन्तु

खंडित उर का विश्वास हो गया.

 

पारा जा पहुँचा पचास पर,

घर बाहर है एक कहानी.

संग नदी के सूख रहा है,

मानव की आँखों का पानी.

 

तपते हुए अषाढ़ कट रहा,

सावन सूखा मास हो गया.  

 

कंकरीट के जंगल आये,

सबका हृदय कठोर कर गए.

घर के आँगन जाते जाते,

रिश्तों को कमजोर कर गए.

 

नागफनी का राजतिलक है,

तुलसी को वनवास हो गया.

"मौलिक एवं अप्रकाशित "

 

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Comment by बसंत कुमार शर्मा on July 23, 2017 at 12:36pm

आदरणीय डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव जी, आपकी हौसला अफजाई और अनुकरणीय सुझाव को सादर नमन , इसी तरह आशीष बनाये रखें सादर 

Comment by बसंत कुमार शर्मा on July 23, 2017 at 12:35pm

आदरणीय गिरिराज भंडारी जी , आपकी मनभावन प्रतिक्रिया को सादर नमन 

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on July 23, 2017 at 9:08am

अधरों पर मुस्कान किन्तु  खंडित उर का विश्वास हो गया. (१४,  १८)------------अधरों पर मुस्कान सुसज्जित   खंडित उर-विश्वास हो गया

बहुत ही सुन्दर रमणीय गीत आदरणीय .


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on July 20, 2017 at 11:44am

क्या बात है , आदरणीय बसंत भाई , बेहतरीन गीत रचना की है आपने , हार्दिक बधाइयाँ स्वीकार करें ।

Comment by बसंत कुमार शर्मा on July 20, 2017 at 10:25am

आदरणीय रवि शुक्ल जी आपकी हौसला अफजाई का दिल से शुक्रिया 

Comment by Ravi Shukla on July 20, 2017 at 9:45am

आदरणीय बसंत कुमार जी बहुत सुन्‍दर नवगीत लिखा आपने भाव और कथ्‍य की दृष्टि दोनो से ही अच्‍छा लगा  । बधाई स्‍वीकार करें

Comment by बसंत कुमार शर्मा on July 19, 2017 at 5:00pm

आदरणीय Samar kabeer  जी, आपकी हौसला अफजाई के लिए दिल से बहुत बहुत शुक्रिया, आपके आदेश का अवश्य पालन होगा. यह ठीक भी होगा कि विधा लिखी जाये   

Comment by Samar kabeer on July 19, 2017 at 2:25pm
जनाब बसंत कुमार शर्मा जी आदाब,बहुत सुंदर भावों से सजी इस रचना के लिये दिल से बधाई स्वीकार करें ।
एक निवेदन ये है कि कृपया रचना के साथ उसकी विधा भी लिख दिया करें ।

कृपया ध्यान दे...

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