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ग़ज़ल -कायम रहा रुतबा तेरा

2212 2212 2212 2212

बस रात भर की बात थी , फिर भी रहा पहरा तेरा ।
ऐ चाँद तेरी बज़्म में कायम रहा रुतबा तेरा ।।

वो तीरगी जाती रही रोशन लगी हर शब मुझे ।
मेरे तसव्वुर में कभी जब अक्स ये उभरा तेरा ।।

टूटा हुआ तारा था इक हँसता रहा क्यूँ कहकशां ।
यूँ ही जमीं से देखता मैं रह गया लहज़ा तेरा ।।

देकर गई है मुफ़लिसी ,कुछ तज्रिबा भी कीमती ।
मुझको अभी तक याद है ,बख़्शा हुआ सदक़ा तेरा।।

है जिक्र तेरे हुस्न का बाकी कोई चर्चा नहीं ।
है चार सू खुशबू तेरी छाया रहा जलवा तेरा ।।

रानाइयों के फेर में हम भी हरम में आ गए ।
देखा हया के वास्ते गिरता रहा परदा तेरा ।।

सारा ज़माना हो गया दुश्मन मेरा इस बात पर ।
कातिल बनाकर उम्र भर जारी रहा फ़तबा तेरा ।।

नज़रों की थी ग़फ़लत या फिर
वह ख्वाब था मेरा कोई ।
महफ़िल में चर्चा है बहुत आकर चला जाना तेरा ।।

मायूस है सारा चमन मायूस दीवाने हुए ।
जब से दुपट्टे में छिपा है चाँद सा चेहरा तेरा ।।

खामोशियों के बीच से उठने लगे हैं कुछ सवाल ।
वो मिन्नतें करता रहा पर दिल नहीं पिघला तेरा ।।

नवीन मणि त्रिपाठी
मौलिक अप्रकाशित
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Comment by Dr Ashutosh Mishra on August 3, 2017 at 5:36pm
सूंदर रचना
Comment by Naveen Mani Tripathi on August 2, 2017 at 11:16am
आ0 भाई गुरुप्रीत जी सादर आभार ।
Comment by Naveen Mani Tripathi on August 2, 2017 at 11:15am
आ0 कबीर सर सदैव आपका सम्मान हृदय से है ।
Comment by Samar kabeer on August 2, 2017 at 11:08am
बहुत उम्दा तब्दीली,मेरे कहे को मान देने के लिये धन्यवाद ।
Comment by Gurpreet Singh jammu on August 2, 2017 at 11:01am

आदरणीय नवीन मणि जी,, बहुत खूबसूरत ग़ज़ल कही  है आपने,, बधाई कुबूल करें 

Comment by Naveen Mani Tripathi on August 1, 2017 at 9:27pm
भाई बसन्त कुमार जी सादर आभार
Comment by Naveen Mani Tripathi on August 1, 2017 at 6:46pm
आदरणीय कबीर सर ग़ज़ल के आखिरी शेर की आखिरी पंक्ति में परिवर्तन कर दिया है । वो मिन्नतें करता रहा पर दिल नहीं पिघल तेरा ।।
Comment by Naveen Mani Tripathi on August 1, 2017 at 6:27pm
आ0 कबीर सर बहुत देर से आपकी टिप्पणी प्रतीक्षित थी । हार्दिक नमन के साथ आभार । शीघ्र ही दूसरा शेर लिख कर और ऑडिट करके पोस्ट करता हूँ ।
Comment by Samar kabeer on August 1, 2017 at 6:12pm
जनाब नवीन मणि त्रिपाठी जी आदाब,उम्दा ग़ज़ल हुई है,शैर दर शैर दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ ।

चौथे शैर में 'अह्ल-ए-ख़ुदा'बहुवचन का सीग़ा है, इसकी जगह "बख़्शा हुआ" कर सकते हैं ।

आख़री शैर में 'सजदा तेरा'ग़लत है,सजदा तुझे'सही होगा,लेकिन रदीफ़ की वजह से ऐसा करना मुमकिन नहीं,शैर ख़ारिज करने के अलावा कोई रास्ता नहीं है ।
Comment by बसंत कुमार शर्मा on August 1, 2017 at 5:03pm

बहुत खूबसूरत अल्फाज वाह 

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