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"सुशील , शालिनी को लेने कब जाएगा ?" माँ ने चिंतित स्वर में कहा ।
" कब है रक्षा-बंधन ?"
"बस ! आज से ठीक चार दिन बाद ।
"मगर...मगर...।"
" क्या मगर , मगर ।'
" कुछ नहीं माँ.....।"
अब सुशील माँ से कैसे कहे कि उसने शालिनी की मोटी उधार की रकम आज तक नहीं चुकाई जो माँ के बग़ैर पूछे ले आया था ।
मौलिक एवं अप्रकाशित ।

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Comment by Mohammed Arif on August 7, 2017 at 8:30am
बहुत-बहुत आभार आदरणीय सुरेंद्रनाथ जी । आपकी उत्साहवर्धक टिप्पणी से लेखन सार्थक हो गया ।
Comment by नाथ सोनांचली on August 7, 2017 at 8:27am
जनाब मोहम्मद आरिफ भाई जी सादर अभिवादन, लघुकथा का शानदार रूप,बहुत खूब,दिल खोल कर बधाई लीजिये।सादर
Comment by Mohammed Arif on August 6, 2017 at 11:03pm
आदरणीय मोहित मुक्त जी आपकी टिप्पणी और हौसला अफ़ज़ाई का बहुत-बहुत आभार ।
Comment by Mohammed Arif on August 6, 2017 at 11:00pm
आदरणीय तस्दीक़ अहमद साहब आपकी टिप्पणी से संबल मिला । बहुत-बहुत आभार ।
Comment by Mohammed Arif on August 6, 2017 at 10:58pm
आली जनाब मोहतरम समर कबीर साहब आदब, आपकी हौसला अफज़ाई , निरपेक्ष टिप्पणी से काफी संबल मिला । बहुत-बहुत आभार ।
Comment by Mohammed Arif on August 6, 2017 at 6:47pm
आदरणीय शेख शहज़ाद उस्मानी जी आदाब,आपकी पहली सटीक , निरपेक्ष प्रतिक्रिया ने ने सफल लघुकथा होने की मुहर लागा दी । मुझे हमेशा आपकी और आली जनाब समर कबीर साहब की प्रतिक्रिया का इंतज़ार रहता है । बहुत-बहुत शुक्रिया ।
Comment by Tasdiq Ahmed Khan on August 6, 2017 at 3:42pm
मुहतरम जनाब आरिफ साहिब ,गागर में सागर भर दिया अपने ,उम्दा लघुकथा ,मुबारकबाद क़ुबूल फरमाएं। उस्मानी साहिब की प्रतिक्रिया में अपने गलती मेरा नाम टाइप करदिया है
Comment by Samar kabeer on August 6, 2017 at 2:34pm
जनाब मोहम्मद आरिफ़ साहिब आदाब,कम शब्दों में बड़ी बात कहना भी एक फ़न है, जो सबको नहीं आता,बहुत उम्दा और कामयाब लघुकथा के लिये दिल से बधाई स्वीकार करें ।
Comment by Sheikh Shahzad Usmani on August 6, 2017 at 9:56am
'रक्षाबंधन' को सार्थक करती एक-दूसरे के प्रति 'कर्ज़/उधारी/दायित्व' आदि के बंधन को उभारती छोटी-सी, किन्तु विचारोत्तेजक बढ़िया प्रस्तुति के लिए तहे दिल से बहुत-बहुत बधाई मुहतरम जनाब मोहम्मद आरिफ़ साहब। यह दुविधा की स्थिति कई भाईयों या बहिनों के साथ रहती/रह सकती है। सत्य व यथार्थ। सादर।

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