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बह्र:1222 1222 122

नहीं पहले-सी चेहरे पे चमक है
हँसी में आपकी गम की झलक है

नहीँ आमाल में जिसकी है नीयत
उसी की क़ामयाबी पे भी शक है

कोई तो खेल में पानी बहाता
कहीं पर प्यासा मरने की धमक है

पहुँचना उसका ही होगा फलक तक
नज़र जिसकी बहुत आगे तलक है

रहेगी रात तन्हा, दिन अकेला
हमारा साथ कुछ ही देर तक है

उसे बंदिश भला क्या रोक पाए?
नजर में जिसकी ये सारा फलक है

मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment

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Comment by Samar kabeer on August 6, 2017 at 6:20pm
जनाब सतविन्द्र कुमार'राणा'साहिब आदाब,ग़ज़ल का अच्छा प्रयास हुआ है,दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ ।
मतले के सानी मिसरे पर जनाब गिरिराज भाई का सुझाव उत्तम है ।
दूसरे शैर में क़ाफ़िया दोष है,सही शब्द "हक़" है,देखियेगा ।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on August 6, 2017 at 6:05pm

आ. सतविन्द्र भाई , मुझे मालूम है कि मे और जोड़ने से मिसरा बेबहर हो जायेगा , भाषा के हिसाब से -- मे झलक है.. कहना पूर्न होगा । 

चाहें तो आप ऐसा कह सकतेहैं ---   हँसी मे आपकी गम की झलक है --
वैसे आप चाहें तो वही मिसरा रखें .. आप इसके लिये स्वतंत्र हैं ।

Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on August 6, 2017 at 5:52pm
आदरणीय गिरिराज सर,सादर नमन! प्रयास का अनुमोदन कर सराहने के लिए सादर हार्दिक आभार।
सर पूरे शेर को एक ही नजर से पढ़ने और सानी को ऐसे /बनावट की हँसी, गम की झलक है/ तो एक ही भाव को बाँधने में शायद सही है। में शब्द लिखने से मिसरा बेबह्र भी हो जाता है। सादर

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on August 6, 2017 at 5:33pm

आदरणीय सतविन्द्र भाई , अच्छी गज़क हुई है , शे र दर शेर बधाई स्वीकार करें ।

 मतले के इस मिसरे में --बनावट की हँसी ( में ) गम की झलक है   --  ' में ' की कमी लग रही है ।

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