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गजल(आज चढ़ता जा रहा पारा बहुत)

2122 2122 212
आज चढ़ता जा रहा पारा बहुत
मौसमों ने भी लिया बदला बहुत।1

बर्फ पिघली,बह गया पानी कहाँ?
हो गया ऊँचा शिखर बौना बहुत।2

फिर चिरागों ने दबोची रोशनी
वक्त गुजरा याद है आता बहुत।3

नाचघर-सी हो गयी संसद भली
भांड ढुलमुल नाचता-गाता बहुत।4

आसमानों में चढ़ीं दुश्वारियाँ
भाव हीरों का लगा पौना बहुत।5

बदगुमानी का सबब हैं कुर्सियाँ
कर्मियों ने भाड़ ही झोका बहुत?6

पार उतरे वे समंदर के,उड़े,
रह गया है आज पछतावा बहुत।7

रेत बनती जा रही प्यासी जमीं
और सबने और भी खोदा बहुत।8

क्या करेंगे आप मरकर?बोलिये,
आदमी ने लाश को गोदा बहुत।9
'मौलिक व अप्रकाशित'

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Comment

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Comment by Manan Kumar singh on August 15, 2017 at 6:51pm
आपका आभार आदरणीय विजय जी।
Comment by Manan Kumar singh on August 15, 2017 at 6:51pm
आपका आभार आदरणीय बृज जी।
Comment by vijay nikore on August 15, 2017 at 4:05pm

अच्छी गज़ल के लिए बधाई

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on August 14, 2017 at 11:01pm
बहुत ही सटीक समसामयिक ग़ज़ल कही है आदरणीय..सादर
Comment by Manan Kumar singh on August 14, 2017 at 7:47pm
बहुत बहुत आभार आदरणीय गुरमीत सिंह जी।
Comment by Gurpreet Singh jammu on August 14, 2017 at 12:24pm

बर्फ पिघली,बह गया पानी कहाँ?
हो गया ऊँचा शिखर बौना बहुत।2
वाह आदरणीय मनन कुमार सिंह जी,, बहुत अच्छी ग़ज़ल कही आपने,,
"फिर चिरागों ने दबोचा रोशनी को"
इस मिसरे में अंत में एक मात्रा बढ़ रही है,, सो बे बह्र हो रहा है,,,

Comment by Manan Kumar singh on August 13, 2017 at 6:21pm
आदरणीय नीरज जी ,शुक्रिया।आजकल लाशों पर भी रहम कहाँ की जाती है?
Comment by Manan Kumar singh on August 13, 2017 at 6:19pm
आदरणीय बसंत शर्मा जी,आपका आभार।
Comment by Niraj Kumar on August 12, 2017 at 6:45pm

आदरणीय मनन जी,

आखिरी शेर अस्पष्ट है. बाकी सारे शेर अच्छे लगे. दाद के साथ मुबारकबाद.

सादर 

Comment by बसंत कुमार शर्मा on August 11, 2017 at 11:11am

बहुत बढ़िया ग़ज़ल हुई आदरणीय, सटीक तंज , वाह वाह , बहुत बहुत बधाई आपको 

कृपया ध्यान दे...

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