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ग़ज़ल नूर की -जैसे धुल कर आईना फ़िर चमकीला हो जाता है,

22/ 22/ 22/ 22/ 22/ 22/ 22/ 2 
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जैसे धुल कर आईना फ़िर चमकीला हो जाता है,
रो लेता हूँ, रो लेने से मन हल्का हो जाता है.
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मुश्किल से इक सोच बराबर की दूरी है दोनों में,
लेकिन ख़ुद से मिले हुए को इक अरसा हो जाता है.
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फोकस पास का हो तो मंज़र दूर का साफ़ नहीं रहता,
मंजिल दुनिया रहती है तो रब धुँधला हो जाता है.
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मन्दिर मस्जिद गुरुद्वारे में कोई काम नहीं मेरा
अना कुचल लेता हूँ अपनी तो सजदा हो जाता है.
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ख़ुद की जानिब क़दम बढ़ाये जाता हूँ मैं सदियों से, 
कभी सफ़र में फ़ानी दुनिया में रुकना हो जाता है.
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यादों के नन्हे छौने जब चरते हैं माज़ी की दूब
पीछे पीछे फिरता ये मन चरवाहा हो जाता है.
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हरदम लड़ता रहता है हर बात पे मुझ से मेरा दिल
और मेरे पीछे हटते ही समझौता हो जाता है.
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जब वो गले लगाता है तो रूह महकती है मेरी,
बारिश की पहली बूँदों से घर सौंधा हो जाता है.
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“नूर” वली से लगते हो जब मैख़ाने के होते हो 
लेकिन दुनिया के होते ही सच झूठा हो जाता है..
.
निलेश "नूर"
मौलिक/ अप्रकाशित 

Views: 2168

Comment

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Comment by Tasdiq Ahmed Khan on September 16, 2017 at 6:07pm
जनाब नीलेश नूर साहिब ,उम्दा गज़ल हुई है ,मुबारकबाद क़ुबूल फरमायें

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on September 16, 2017 at 5:23pm

आ. निलेश भाई बेहतरीन ग़ज़ल हुई है बहुत बहुत बधाई आपको

Comment by Nilesh Shevgaonkar on September 16, 2017 at 3:00pm

शुक्रिया आ. अफरोज़ जी 

Comment by Nilesh Shevgaonkar on September 16, 2017 at 2:59pm

धन्यवाद @एडमिन ..इस पोस्ट को फीचर्ड ब्लॉग में स्थान देने के लिए 
आभार 

Comment by Afroz 'sahr' on September 16, 2017 at 2:58pm
आदरणीय बहुत सुंदर ग़ज़ल के लिए बहुत सुंदर बधाई हो आप को !वाहहहहहहह

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