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जय हे काली,करालि,कालिके
वसुधा का प्रांगण स्वच्छ करो
दुर्व्यसनी दुष्ट पिशाचों का
संहार करो,संहार करो

विषयी,कामातुर,कुलहंता
करते कलियों का शीलभंग
ऐसे पापी व्यभिचारियों का
तुम अंत त्वरित अविलम्ब करो

नहीं जिन्हें शील कुल की लज्जा
बढ़ रहे रक्तबीजों से जो
उन निर्लज्जों के शोणित का
खप्पर भर भरकर पान करो

पर धन हर्ता महिषासुरों का
जब दर्प भंग कर आओगी
कलियुग के शुंभ निशुंभों का
जब मान रौंदकर आओगी

तब रक्तरंजित असि को तेरी
प्रसून जल से धुलवाएँगे
श्रम तेरा हर लेने को हम
गंगाजल स्नान कराएँगे

फिर धूप दीप घृत चंदन से
तेरी आरती उतारेंगे
नैवेद्य लगा,विश्राम करा
तेरे श्री चरण दबाएँगे

संपूर्ण जगत की अंशभूत
हे आदिभूत चंडिका जया
श्रद्धानत देव,महर्षि,विज्ञजन
तेरा यश गुण गाएँगे

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

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Comment by Usha Awasthi on September 20, 2017 at 7:25pm
धन्यवाद सुरेंद्र नाथ जी।
Comment by Usha Awasthi on September 20, 2017 at 7:24pm
धन्यवाद समर जी।
Comment by Usha Awasthi on September 20, 2017 at 7:23pm
धन्यवाद मोहित जी।
Comment by नाथ सोनांचली on September 20, 2017 at 1:32pm
आद0 उषा जी सादर अभिवादन,सुंदर प्रस्तुति हेतु बधाई स्वीकार करें ।
Comment by Samar kabeer on September 20, 2017 at 12:13pm
मोहतरमा उषा जी आदाब,सुंदर प्रस्तुति हेतु बधाई स्वीकार करें ।
Comment by Usha Awasthi on September 19, 2017 at 11:28am
धन्यवाद सलीम रज़ा जी।
Comment by SALIM RAZA REWA on September 19, 2017 at 10:57am
आ. उषा जी,
ख़ूबसूरत रचना के लिए बधाई,

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