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ग़ज़ल ( कोई देखे हमें महब्बत से )

फाइलातुन -मफ़ाइलुन -फेलुन 


दिल की हसरत यही है मुद्दत से |
कोई देखे हमें महब्बत से |

नामे उल्फ़त से जो नहीं वाक़िफ़
देखता हूँ मैं उसको हसरत से |

सब्र का फल तो खा के देख ज़रा
क्यूँ है मायूस उसकी रहमत से |

जिस ने देखा उन्हें यही बोला
उनको रब ने बनाया फ़ुर्सत से |

उसके हाथों में आइना दे दो
बाज़ आए नहीं जो गीबत से |

देखिए तो करम अज़ीज़ों का
वो हैं बे ज़ार मेरी सूरत से |

तू ने तस्दीक़ बोला है सच ही
यूँ नहीं तू घिरा मुसीबत से |

( मौलिक व अप्रकाशित )

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Comment by Tasdiq Ahmed Khan on October 10, 2017 at 10:58am

जनाब दिनेश कुमार साहिब , ग़ज़ल में आपकी शिरकत और हौसला अफज़ाई का बहुत बहुत शुक्रिया 

Comment by दिनेश कुमार on October 9, 2017 at 6:59am
बहुत उम्दा ग़ज़ल मुहतरम तस्दीक़ साहब। वाह वाह
देखता हूँ मैं उसको हसरत से,,,, और कर भी क्या सकते हैं ☺.
Comment by Tasdiq Ahmed Khan on October 8, 2017 at 7:37pm
मुहतरम जनाब सौरभ साहिब ,ग़ज़ल में आपकी शिरकत और हौसला अफ़ज़ाई का बहुत बहुत शुक्रिया ,महरबानी

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on October 8, 2017 at 11:02am

भाई वाह ! अदरणीय तस्दीक साहब की ये ग़ज़ल चुपचाप चलती हुई कितनी दूरी तय कर रही है !  दाद स्वीकार कीजिए आदरणीय

शुभ-शुभ

Comment by Tasdiq Ahmed Khan on October 8, 2017 at 7:48am
जनाब सुरेन्द्र नाथ साहिब ,ग़ज़ल में आपकी शिरकत और हौसला अफ़ज़ाई का बहुत बहुत शुक्रिया
Comment by Tasdiq Ahmed Khan on October 8, 2017 at 7:47am
मुहतरम जनाब आरिफ़ साहिब आदाब, ग़ज़ल में आपकी शिरकत और हौसला अफ़ज़ाई का बहुत बहुत शुक्रिया
Comment by सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' on October 8, 2017 at 7:29am
आद0 तस्दीक अहमद साहब स्आदर अभिवादन, बहुत बढ़िया ग़ज़ल कहीं आपने, शेर दर शैर दाद के साथ दिली मुबारकबाद।
सब्र का फल तो खा के देख ज़रा
क्यूँ है मायूस उसकी रहमत से |
जिस ने देखा उन्हें यही बोला
उनको रब ने बनाया फ़ुर्सत से |
क्या उम्दा ख्याल लाये आप,पुनश्च बधाई।
Comment by Mohammed Arif on October 6, 2017 at 8:04pm
आदरणीय तस्दीक़ अहमद जी आदाब,बहुत अच्छी ग़ज़ल । शे'र दर शे'र दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल करें ।
Comment by Tasdiq Ahmed Khan on October 6, 2017 at 5:27pm
जनाब राज नवादवी साहिब ,ग़ज़ल में आपकी शिरकत और हौसला अफ़ज़ाई का बहुत बहुत शुक्रिया।
Comment by Tasdiq Ahmed Khan on October 6, 2017 at 5:25pm
मुहतरम जनाब समर कबीर साहिब आदाब ,ग़ज़ल में आपकी शिरकत और हौसला अफ़ज़ाई का बहुत बहुत शुक्रिया ,महरबानी

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