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इन दिनों कविता को
थकान और कमज़ोरी है
रागात्मकता पर
हो रहे हैं
लगातार हमलें
काव्य-बोध न होने से
उसके पैर लड़खड़ा रहे हैं
भाव , कल्पना न होने से
कभी-कभी चक्कर खाकर
औंधे मुँह गिर जाती है
जिव्हा भी लड़खड़ा रही है
अभिव्यक्ति न होने से
उसे बार-बार चक्कर आते हैं
सौंदर्यबोध न होने से
अंदर ही अंदर जैसे
उसे घुन लग गई है
क्या कविता भी
डायबिटीक नहीं हो गई है ?

मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by Sheikh Shahzad Usmani on October 14, 2017 at 7:43pm
सत्य बयान करता बेहतरीन कटाक्षपूर्ण नवीनतम सृजन। ऐसे ही नव जागरण लाया जा सकता है। सादर हार्दिक बधाई आदरणीय मोहम्मद आरिफ़ साहब।

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