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तन पत्थर है मन पत्थर (एक छोटी बह्र की ग़ज़ल 'राज')

२२ २२ २२ २

खुद ही काटे अपने  पर

क्या धरती अब क्या अम्बर

 

कोई खिड़की न कोई दर

कितना उम्दा अपना  घर

 

दुनिया तेरी धरती पर  

अपनी हद बस ये गज भर

 

बंद कफ़स हो चाहे खुला

तुझको अब कैसा है डर

 

सारा आलम  रख ले तू

मेरी अब परवाह  न कर

 

मेरी अपनी मंजिल है

तेरी अपनी राह गुज़र   

 

बेजा  अब हैं तीर तेरे  

तन पत्थर है मन पत्थर 

मौलिक एवं अप्रकाशित 

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on November 1, 2017 at 7:13pm

आद० विजय निकोर जी ,आपका तहे दिल से शुक्रिया |


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on November 1, 2017 at 7:13pm

आद० समर भाई जी ,आपको ग़ज़ल पसंद आई मेरा लेखन सफल हो गया .दिल से बेहद शुक्रिया आपका |अजय तिवारी जी की इस्स्लाह मुझे भी सही लगी .


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on November 1, 2017 at 7:11pm

आद० सुरेन्द्र नाथ भैया ,आपको ग़ज़ल पसंद आई दिल से बहुत बहुत शुक्रिया 

Comment by vijay nikore on November 1, 2017 at 4:52pm

गज़ल बहुत ही अच्छी लगी। बधाई, आदरणीया राजेश जी।

Comment by Samar kabeer on November 1, 2017 at 2:30pm
बहना राजेश कुमारी जी आदाब,अच्छी ग़ज़ल हुई है,दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ ।
जनाब अजय तिवारी जी की इस्लाह उत्तम है ।
Comment by नाथ सोनांचली on November 1, 2017 at 1:52pm
आद0बहन राजेश कुमारी जी सादर अभिवादन, छोटे बह्र की बढ़िया ग़ज़ल कही आपने शैर दर शैर मुबारकबाद कुबूल फरमायें।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on November 1, 2017 at 10:06am

आद० शेख उस्मानी जी ,आपको ग़ज़ल पसंद आई आपका दिल से शुक्रिया 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on November 1, 2017 at 10:05am

आद० डॉ० छोटे लाल जी आपका दिल से बहुत बहुत शुक्रिया  


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Comment by rajesh kumari on November 1, 2017 at 10:04am

आपकी इस्स्लाह अच्छी है अजय जी 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on November 1, 2017 at 10:03am

आद० अजय तिवारी जी आपका बहुत बहुत शुक्रिया 

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