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फूलों की लड़ाई ( कविता)

देखी एक दिन फूलों की लडाई 

रहते थे अब तक जो बन भाई - भाई |

काँटों से निकल कर गुलाब बोला 

सूरज ने जब रात का पट खोला 

मेरी खुशबू से खिलता है बाग़

समाज जाते हैं लोग खिल गया गुलाब

सुन रहे थे यह और भी फूल कई 

नहीं हैं हम भी मिटटी या धूल कोई 

बाग में हो रही थी सबकी बहस 

हो रहा था बाग तहस नहस 

कीचड़ से कमल खिल उठा 

देख सबको वह बोल उठा 

देखो खुद को , सोचो तो सही 

सब हो सुंदर , सब रहते हो वहीँ 

क्यों लड़ते हो यूँ जानवरों के तरह 

हो जाओगे क्या किसी और की तरह 

हो सभी प्यारे , सबकी अपनी पहचान 

फिर लड़कर क्यों मचाते हो मचान 

क्या गुलाब ,क्या मोगरा , क्या चमेली 

क्या होगा जब न खिलेगी कोई कली 

देखो मुझको मेरा घर कहाँ हैं 

तुम मिटटी में मेरा घर यहाँ है 

गन्दा कीचड़ , बदबू से भरा है 

सब बोले - कमल तो खरा है 

अब तय करो सभी कौन छोटा 

और कौन बड़ा है ?

कौन अच्छा और कौन बुरा है ?

मौलिक एवं अप्रकाशित 

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Comment

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Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on November 1, 2017 at 7:39pm
बड़ी अच्छी कविता हुई आदरणीया..सादर
Comment by Samar kabeer on November 1, 2017 at 5:11pm
बहना कल्पना भट्ट'रौनक़'जी आदाब,अच्छी कविता लिखी आपने,लेकिन तुकान्तता पर ध्यान नहीं दिया,कुछ टंकण त्रुटियाँ भी हैं,बहरहाल इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।
Comment by Balram Dhakar on October 31, 2017 at 8:04pm
आदरणीया कल्पना जी, बहुत बेहतरीन कविता। हार्दिक बधाई।
सादर।
Comment by Dr Ashutosh Mishra on October 31, 2017 at 7:07pm
आदरणीया कल्पना जी इस रचना में समाज के लिए सार्थक सन्देश हैसमाज जाते हैं लोग खिल गया गुलाब समाज की जगह शायद समझ होगारचना पसंद आयी कही कही कुछ और सुधार हो सकता है इस रचना के लिए हार्दिक बधाई सादर
Comment by KALPANA BHATT ('रौनक़') on October 31, 2017 at 2:05pm

धन्यवाद आदरणीय मोहित जी|

Comment by KALPANA BHATT ('रौनक़') on October 31, 2017 at 2:04pm

धन्यवाद् आदरणीय डॉ छोटेलाल सिंह जी|

Comment by डॉ छोटेलाल सिंह on October 31, 2017 at 12:16pm
बहुत बेहतरीन भाव परक उम्दा सृजन के लिये आपको बधाई

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