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(ग़ज़ल - इस्लाह के लिए) अक्सर तन्हाई में रोया करता हूँ -(गुरप्रीत सिंह)

22-22-22-22-22-2

अक्सर तन्हाई में रोया करता हूँ।
अपने आँसू ख़ुद ही पोंछा करता हूँ।

देर तलक आईना देखा करता हूँ।
जाने उसमें किसको ढूँढा करता हूँ।

दिल में दर्द उठे तो फ़िर क्या करता हूँ?
बस उसकी तस्वीर से शिक्वा करता हूँ।

क्या वो अब भी याद मुझे करता होगा?
ख़ुद से ऐसी बातें पूछा करता हूँ।

एक न इक दिन पत्थर पिघलेगा पगले!
ये कह के दिल को बहलाया करता हूँ।

शाम ढले वो तोड़ दिया करता हूँ मैं,
सुब्ह जो अक्सर ख़ुद से वादा करता हूँ।

मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment

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Comment by Mohammed Arif on November 5, 2017 at 7:49am
आदरणीय गुरप्रीत जी आदाब, दर्द से लबरेज़ बेहतरीन ग़ज़ल के लिए दिली मुबारकबाद क़ुबूल करें । बाक़ी गुणीजन अपनी राय देंगे ।
Comment by Ram Awadh VIshwakarma on November 4, 2017 at 9:43pm
आदरणीय गुरप्रीत सिंह जी आदाब
खूबसूरत ग़ज़ल के लिये बधाई। लेकिन 'क्यों करता हूँ हुस्न से वफा की उम्मीदे,मिसरे पर गौर करने की ज़रूरत है। सादर

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