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तेरे आने से धुंआ छँटना ही था--- पंकज कुमार मिश्र, गजल

2122 2122 212

धीरे धीरे फासला घटना ही था
हौले हौले रास्ता कटना ही था

एक भ्रम का कोई पर्दा अब तलक
मन पे अपने था पड़ा, हटना ही था

ख़ाहिशें हैं जब मेरी तुमसे ही तो
लब से तेरे नाम को रटना ही था

हर तरफ़ है लोभ प्रेरित आचरण
चित ये जग से तो मेरा फटना ही था

किस तरफ जाता कुहासा था घना
तेरे आने से धुंआ छँटना ही था

मौलिक अप्रकाशित

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Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on November 6, 2017 at 9:32pm
आदरणीय ब्रजेश जी आपने सही पकड़ा है, उक्त शेर को जल्द सुधारूँगा
Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on November 6, 2017 at 9:28pm
बड़ी अच्छी ग़ज़ल कही आदरणीय...इसे समीक्षात्मक टिप्पड़ी कतई न समझें..ग़ज़ल में दो काफिये निभाए गए हैं लेकिन तीसरा शेर भिन्न हो रहा है..क्या मैं सही हूँ..??सादर
Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on November 6, 2017 at 6:13pm
आदरणीय बाऊजी आपके सुझाव हमेशा ही उचित होते हैं, मुझे सीखने में सहायता प्रदान करते हैं।

आपने सही कहा, दोष है; मैं सुधारता हूँ, जल्द ही।

इस ग़ज़ल में एक खास पैटर्न है, एक बार उस पर भी वाद प्रदान करें,

इस ग़ज़ल में काफ़िया नहीं, काफ़िये हैं।।।

सादर
Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on November 6, 2017 at 6:10pm
आदरणीय आरिफ़ सर सादर आभार।
Comment by Samar kabeer on November 6, 2017 at 5:32pm
अज़ीज़म पंकज कुमार मिश्रा आदाब,ग़ज़ल का अच्छा प्रयास हुआ है,बधाई स्वीकार करें ।
'ख़्वाहिशें हैं जब मेरी तुमसे ही तो
लब से तेरे नाम को रटना ही था'
इस शैर में शुतरगुर्बा है, इसे यूँ कर सकते हैं :-
'ख़्वाहिशें हैं जब मेरी तुझसे ही तो
मुझको तेरे नाम को रटना ही था'
Comment by Mohammed Arif on November 6, 2017 at 8:07am
शे'र दर शे'र दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल कीजिए आदरणीय पंकज जी । बाक़ी गुणीजन अपनी राय देंगे ।

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