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हरेक ज़ुल्म गुनाह-ओ- ख़ता से डरते हैं - सलीम रज़ा रीवा ( ग़ज़ल )

  • 1212 1122 1212 22
    -
    हरेक ज़ुल्‍म गुनाह-ओ- ख़ता से डरते हैं.
    जिन्हे है ख़ौफ़-ए-ख़ुदा वो ख़ुदा से डरते हैं 
    -
    न मुश्किलों से न जौर-ओ-जफ़ा से डरते हैं.
    ग़म-ए-हयात की  काली घटा से डरते हैं 
    -
    किसी ग़रीब की मुझको न आह लग जाए.
    इसीलिए तो हरिक बद्दुआ से डरते हैं
    -
    बड़ा सुकून  है चैन-ओ-क़रार है दिल को.
    बदलते दौर की आब-ओ-हवा से डरते हैं 
    -
    जिन्हे ख़बर ही नहीं इश्क़ भी इबादत है.
    वही तो प्यार- मुहब्बत वफ़ा से डरते हैं
    -
    ये छीन लेती है सब्र-ओ-क़रार का आलम.
    किसी हसीन की  काफ़िर-अदा से डरते हैं
    -
    ख़ता-मुआ'फ़ तो होती है जानते हैं रज़ा.
    किसी  गुनाह कि हम इंतिहा  से डरते है
    ............
    मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by SALIM RAZA REWA on November 16, 2017 at 12:02pm

आली जनाब तस्दीक़ साहिब ,
आपकी ग़ज़ल पे शिरकत और महब्बत के लिए शुक्रिया ,

Comment by SALIM RAZA REWA on November 16, 2017 at 12:01pm

दरणीय सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' जी ,
आपकी नवाजिश के लिए बहुत बहुत शुक्रिया।

Comment by Tasdiq Ahmed Khan on November 16, 2017 at 10:54am

जनाब सलीम साहिब , उम्दा ग़ज़ल हुई है ,मुबारकबाद क़ुबूल फरमाएँ 

Comment by SALIM RAZA REWA on November 15, 2017 at 4:34pm
सुरेंद्र नाथ जी,
आपकी ग़ज़ल पर शिर्कत और आपकी नज़रे इनायत के लिए शुक्रिया,
Comment by नाथ सोनांचली on November 15, 2017 at 2:16pm
ख़ता-मुआ'फ़ तो होती है जानते हैं रज़ा.
मगर गुनाह कि हम इंतिहा से डरते है
आद0 सलीम रज़ा रीवा साहब सादर अभिवादन, बहुत बेहतरीन ग़ज़ल कही आपने, लगभग हरेक शैर कुछ न् कुछ बयानी करता है जो सीधे वाह वाह कहने पर मजबूर कर रहा है, उस ग़ज़ल पर शैर दर शैर मुबारकबाद और दाद कबूल करें।सादर
Comment by SALIM RAZA REWA on November 14, 2017 at 7:37pm
आली जनाब समर साहब,
ग़ज़ल में आपकी शिरकत से से हौसला मिलता है, लेकिन माफ़ी चाहूंगा पर शायद आप तबीयत के वज़ह या और कुछ वज़ह से मेरी ग़ज़लों को दिल से नहीं देख रहें है, मुझे अक़ीदा है कि आप के दिल से देखने के बाद कोई कमी छूटने नहीं पाती, पर अब आप कमिओं को नज़र अंदाज़ कर देते हैं... माफ़ी के साथ ये नाचीज़..
Comment by SALIM RAZA REWA on November 14, 2017 at 7:32pm
आ विजय जी, आपकी ग़ज़ल पर शिर्कत के लिए शुक्रिया.
Comment by SALIM RAZA REWA on November 14, 2017 at 7:30pm
आ. आशुतोष मिश्रा जी,
आपकी महब्बत के लिए शुक्रिया, महब्बत सलामत रहे.
Comment by SALIM RAZA REWA on November 14, 2017 at 7:28pm
आ. बृजेश जी,
आपकी नज़रे इनायत के लिए शुक्रिया, महब्बत सलामत रहे,
Comment by SALIM RAZA REWA on November 14, 2017 at 7:27pm
आ. दीदी राजेश कुमारी जी,
आपकी नज़रे इनायत के लिए शुक्रिया, आपकी महब्बत सलामत रहे.

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