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लघुकथा--एटीकेट्स

" विजेश ! विजेश ! हू इज़ विजेश ।"
" आई एम विजेश सर ।" डरता-डरता विजेश सिर झुकाकर खड़ा हो गया ।
" व्हेरी गुड ! यू आर विजेश । तुम्हारी कई दिनों से शिकायतें आ रही है कि तुम क्लास और स्कूल परिसर में गुटखा-पाऊच खाते हो । क्या यह सच है ? जवाब दो ।"
थोड़ी चुप्पी के बाद वह साहस जुटाकर बोला-" सॉरी सर , बट आज के बाद कभी नहीं खाऊँगा । प्रॉमिस सर !"
" ओके ! सीट डाउन एण्ड मैण्टेन यूअर एटीकेट्स । अब सभी बुक निकालकर रीडिंग शुरू करें ।" पूरी क्लास लेसन रीडिंग में तल्लीन हो गई । थोड़ी ही देर में सर ने पेन में से रिफिल निकाली और कान से मैल निकालने लगे । जेब से सुपारी के दाने निकाले और चबाने लगे । कुछ लड़के अपने पास बैठे साथी को कोहनी मारकर सर कि ओर इशारा कर रहे थे ।
मौलिक एवं अप्रकाशित ।

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Comment by Mohammed Arif on November 15, 2017 at 2:20pm
आदरणीय सुरेंद्रनाथ जी आदाब, शिक्षक शिक्षा का दाता ही नहीं अपितु पूरे समाज का चरित्र भी होता है । समाज में सबसे ज़ियादा सम्मान का पात्र भी शिक्षक ही होता है । अगर शिक्षक ही पूरी लत से ग्रसित रहेगा तो फिर बच्चों पर क्या असर होगा । समाज में वैसे भी आदर्शों का लोप होता जा रहा है । रचना पर बेहतरीन टिप्पणी देकर सार्थक बनाने का बहुत-बहुत आभार ।
Comment by नाथ सोनांचली on November 15, 2017 at 2:05pm
आद0 मोहम्मद आरिफ जी सादर अभिवादन, बेहद उम्दा लघुकथा, यह सच है कि दुनिया तो सभी बदलना चाहते है लेकिन खुद को बदलना कोई नहीं, लोग औरो में कमीं निकाल लेते है जबकि खुद के दोष को नहीं देख पाते, और एक शिक्षक के लिए तो यह और महत्वपूर्ण हो जाता है क्योकि वह पथप्रदर्शक होता है। पुनः बधाई आपको। सादर
Comment by Mohammed Arif on November 15, 2017 at 8:21am
सटीक टिप्पणी के लिए हार्दिक आभार आदरणीय विजय निकोर जी ।
Comment by vijay nikore on November 14, 2017 at 7:10pm

आज के माहोल में शिक्षक का role बहुत ही महत्वपूर्ण है, परन्तु इसको जानने के लिए, इस पर पूरा उतरने के लिए शिक्षक को भी शिक्षा की ज़रूरत है.. । आपने इस लघु कथा द्वारा बहुत कुछ सोचने को दिया है। हार्दिक बधाई, आदरणीय मोहम्मद आरिफ़ जी।

Comment by Mohammed Arif on November 14, 2017 at 2:38pm
बहुत-बहुत आभार आदरणीय आशुतोष जी । लेखन सार्थक हुआ ।
Comment by Dr Ashutosh Mishra on November 14, 2017 at 1:45pm

आदरणीय आरिफ जी बहुत ही शानदार कटाक्ष किया है आपने इस रचना के माध्यम से ..सिखाने वाला जब तक खुद नहीं बदलेगा तब तक किसी परिवर्तन की उम्मीद करना बेमानी है रचना पर हार्दिक बधाई के साथ सादर 

Comment by Mohammed Arif on November 13, 2017 at 6:32pm
आली जनाब मोहतरम समर कबीर साहब आपकी सटीक टिप्पणी से लेखन सार्थक हो गया । बहुत-बहुत शुक्रिया ।
Comment by Samar kabeer on November 13, 2017 at 3:21pm
जनाब मोहम्मद आरिफ़ साहिब आदाब,हमेशा की तरह एक उम्दा लघुकथा लिखी आपने,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।
Comment by Mohammed Arif on November 13, 2017 at 11:02am
आदरणीय विजय शंकर जी आदाब,
कथा के निरपेक्ष अनुमोदन और हौसला अफजाई

का बहुत-बहुत शुक्रिया ।
Comment by Mohammed Arif on November 13, 2017 at 8:33am
आदरणीय शेख शहज़ाद उस्मानी जी आदाब,
आजकल गंदी राजनीति ने सबकी मानसिकता का दिवाला निकाल दिया है । समज में आदर्शों का अकाल पड़ा है । कोई बेहतर आदर्श नज़र ही आ रहे । अभी पिछले दिनों कई बाबाओं के चरित्र सामने आए । ये चरित्र किस ओर संकेत करते हैं । इनसे हमारे बच्चें क्या सीख लेंगे । समाज की रीढ़ शिक्षा है । सबसे ज़ियादा भरोसा शिक्षक पर किया जाता है । बच्चे सबसे बड़ा रोल मॉडल अपने शिक्षक को ही मानते हैं मगर आज देखने में आता है कि शिक्षक का आचरण ही ठीक नहीं ।
कथा का अनुमोदन और निरपेक्ष भाव से सटीक टिप्पणी देने का बहुत-बहुतत्रदिली शुक्रिया ।

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