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तु देश का भविष्य है,
ऐ कैसा तेरा भेष है,
जिस कंधों पर होना चाहिए बस्ता,
उस कंधों पर कितना बोझ है !!

तु उन चारदीवारों से क्यों दूर है,
शिक्षा की मन्दिर से कहां गुम है,
जिस हाथ में होना चाहिए कलम,
उस हाथ को चाय बेचने का काम है !!

ज़िन्दगी का अध्ययन का पल तुमसे क्यों दूर है,
आखिर तू भी उसी अल्लाह का नूर है,
जिस आंखों में होना चाहिए ख्वाब,
उन आँखों में दर्द आंसूओं का सैलाब है !!

सरकार और परिवार चुप क्यों है,
ये बच्चे चिलचिलाते धूप में क्यों हैं,
सरकार और परिवार को इस पर करना चाहिए विचार,
इनको भी मिले जीवन जीने का अधिकार।

सुशील कुमार वर्मा

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Comment by नाथ सोनांचली on November 15, 2017 at 2:12pm
आद0 सुशील जी सादर अभिवादन, रचना का भाव पक्ष बेहतरीन है, कला पक्ष को भी देखिए, बहुत सुंदर कविता बनेगी। कुछ वर्तनीगत त्रुटियों को भी दूर करना है। इस प्रयास पर बधाई।
Comment by vijay nikore on November 14, 2017 at 7:12pm

अति सुन्दर रचना के लिए बधाई।

Comment by डॉ छोटेलाल सिंह on November 13, 2017 at 6:13pm
आदरणीय सुनील जी आपकी भावनाओं का मैं कद्र करता हूँ कविता में आप जो कहना चाह रहे हैं वो झलक रही है ,शेष धीरे धीरे सब ठीक हो जाएगा ,कोई पेट से नही सीखता प्रयास करते रहें, सादर नमन
Comment by Samar kabeer on November 13, 2017 at 3:27pm
जनाब सुशील कुमार वर्मा जी आदाब,बहुत उम्दा कविता लिखी आपने,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।
Comment by Sushil Kumar Verma on November 12, 2017 at 12:31pm
धन्यवाद
Comment by Mohammed Arif on November 12, 2017 at 12:16pm
आदरणीय सुशील कुमार जी आदाब,
ओबीओ मंच पर मैं पहली बार आपकी रचना से संवाद कर रहा हूँ । सबसे पहले आपका हार्दिक अभिनंदन है । स्कूली बच्चे को केंद्र में रखकर लिखीं गई बेहतरीन कविता है । बढ़ते बच्चे के स्कूली बैग से पालकगण भी चिंतित है मगर हमारे में ही दोषपूर्ण शिक्षा प्रणाली है । कुछ वर्तनीगत अशुद्धियाँ हैं जैसे-तु/तू,कहां/कहाँ,ख्वाब/ख़्वाब,कलम/क़लम,आखिर/आख़िर,आंसूओं/आँसुओं । हार्दिक बधाई स्वीकार करें ।
Comment by Sheikh Shahzad Usmani on November 12, 2017 at 12:14pm
बहुत बढ़िया प्रेरक व्यक्तित्व विचारोत्तेजक रचना के लिए सादर हार्दिक बधाई आपको आदरणीय सुशील कुमार वर्मा जी।

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