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अपना सा क्यूँ न मुझको बना कर चले गये।

रोते रहे खुद, मुझको हँसा कर चले गये-
काफ़िर से अपना दिल वो लगाकर चले गये।

पूँछा जो उनसे घर का पता मैंने दोस्तों-
हौश अपना कू-ए-यार बता कर चले गये।

तारीक में वो शम्मा जला कर चले गये-
मैं रूठी और वो मुझको मना कर चले गये।

ग़ाफ़िल थी जिनके इश्क को लेकर मैं आज तक-
तालिब वो मुझको अपना, बना कर चले गये।

मदहोश सी रहती हूँ, न कुछ होश है मुझको-
जब से वो बादः-ए-इश्क पिला कर चले गये।

ताबीर क्या दूँ वस्ल की, ज़ाइद मैं कहूँ-
जब रूख से वो हिजाब हटा कर चले गये।


जाते हुए न रोक सकी,उनको आज मैं-
वो मुझसे अपना हाथ छुड़ा कर चले गये।

अश्कों ने मेरे पूँछा, उनसे जाने का सबब-
मजहब है मुख़्तलिफ ये बता कर चले गये।

खामोश खुद जलते रहे हिज्र-ओ-फिराक में-
"अपना सा क्यूँ न मुझको बना कर चले गये।"


काफ़िर- इस्लाम को न मानने बाला
हौश- घर, जगह
कू-ए-यार :प्रेमिका की गली
तारीक- अँधेरा
ग़ाफ़िल- अन्जान
तालिब- इच्छुक, अभिलाषी
बादः-ए-इश्क: प्रेम मदिरा
ज़ाइद- अधिक, फालतू
मुख़्तलिफ- भिन्न, अलग

मौलिक व अप्रकाशित

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Comment

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Comment by रक्षिता सिंह on November 29, 2017 at 9:42pm
आदरणीय, कबीर जी।
मेरा मार्गदर्शन करने के लिए बहुत बहुत शुक्रिया। मैं अपनी त्रुटियों को सुधारने का प्रयास करूँगी।
Comment by रक्षिता सिंह on November 29, 2017 at 9:35pm
आदरणीय, अमित जी मेरा हौसला बड़ाने के बहुत बहुत धन्यवाद।
Comment by Amit Kumar "Amit" on November 27, 2017 at 5:52pm
आदरणीया रक्षिता जी बहुत अच्छी गजल कहने के लिए बहुत-बहुत बधाइयां आपने बहुत अच्छा प्रयास किया।
Comment by Samar kabeer on November 27, 2017 at 11:06am
मोहतरमा रक्षिता सिंह जी आदाब,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है,दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ ।
कुछ बातें आपके संज्ञान में लाना चाहूँगा ।

'काफ़िर से अपना दिल वो लगाकर चले गए'
इस मिसरे में 'काफ़िर'शब्द काम तो सही कर रहा है,लेकिन आपने इस शब्द का जो अर्थ दिया है वो गलत है,'काफ़िर'शब्द के अर्थ हैं,दुश्मन,बैगाना, अफ़ग़ानिस्तान का एक क़बीला, नास्तिक ।
इसी तरह दूसरे शैर में 'हौश'शब्द का अर्थ भी गलत है ।
तीसरे शैर में 'तारीक'को "तारीकी"करना उचित होगा ।
पांचवें शैर का सानी मिसरा लय में नहीं है ।
छटे शैर का ऊला मिसरा भी लय में नहीं है ।
आठवें शैर का ऊला मिसरा भी लय में नहीं है ।
Comment by रक्षिता सिंह on November 25, 2017 at 1:07pm
बहुत बहुत शुक्रिया,
आदरणीय विजय जी।
Comment by vijay nikore on November 25, 2017 at 8:11am

अच्छी गज़ल ! लुत्फ़ आ गया। बधाई।

Comment by रक्षिता सिंह on November 24, 2017 at 6:38pm
बहुत बहुत शुक्रिया !
माननीय आरिफ जी।
Comment by Mohammed Arif on November 24, 2017 at 9:53am
आदरणीया रक्षिता जी आदाब,
बहुत ही बेहतरीन ग़ज़ल । हर शे'र माकूल । शे'र दर शे'र दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल कीजिए ।बाक़ी गुणीजन अपनी राय देंगे ।

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