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इसके आगे बस खुदा का नाम है।

 
सर पे मेरे इश्क का इल्जाम है,
और दिल का टूट जाना आम है।

हुस्न दौलत इश्क सब बेदाम है,

इसके आगे बस खुदा का नाम है।

दफ़्अतन यूँ जा रहे हो छोड़कर,
क्या तुम्हें कोई जरूरी काम है ?

ठहरो भी बैठे रहो आगोश में,
पीने दो आँखों से, ये जो जाम है।

यूँ ना देखो बेरुखी से अब हमें,
दिल ये तेरे इश्क में बदनाम है।

चल दिए यूँ छोड़ कर दामन मेरा,
क्या यही मेरी वफ़ा का दाम है।

हम तो समझे थे जिसे सबसे जुदा
पर उसे भी काम से ही काम है।

कर चुके रुखसत तेरी यादों को हम
अब कहीं जाकरके कुछ आराम है।

सोजिशे दिल और इंसान गमजदः
इश्क का तो बस यही अंजाम है।।

(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment by सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' on December 26, 2017 at 8:50am

इस ग़ज़ल को यहाँ दुबारा पोस्ट करने का औचित्य

Comment by Samar kabeer on December 24, 2017 at 5:03pm
  1. इस ग़ज़ल पर तरही मुशायरे में टिप्पणी दे चुका हूँ ।
Comment by Mohammed Arif on December 24, 2017 at 1:26pm

आदरणीया रक्षिता जी आदाब,

                        आपने यह ग़ज़ल तरही मुशायरा 90 की ग़ज़ल ब्लॉग पोस्ट पर डाल दी है । मंच का नियम है कि जो ग़ज़ल या अन्य रचनाएँ लाइव आयोजन में हो उसे अपने ब्लॉग पोस्ट पर नहीं डाल सकते । ब्लॉग पोस्ट से इसे हटाना होगा ।

Comment by Kalipad Prasad Mandal on December 24, 2017 at 11:56am

आ रक्षिता सिंह ,आपकी रूमानी ग़ज़ल दिल तक उतर गयी | हर शेर काबिले तारीफ है |दिली  मुबाराक्बाद स्वीकार करें |

कृपया ध्यान दे...

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