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अब न कोई जंग हारा कीजिये

2122 2122 212
अब न कोई जंग हारा कीजिये ।।
अब बुलन्दी पर सितारा कीजिये ।

चाहिए गर कामयाबी इश्क़ में ।
रात दिन चेहरा निहारा कीजिये ।।

चाँद को ला दूं जमी पर आज ही ।
आप मुझको इक इशारा कीजिये ।।

बेखुदी में कह दिया होगा कभी ।
बात दिल मे मत उतारा कीजिये ।।

पालिये उम्मीद मत सरकार से ।
जो मिले उसमे गुजारा कीजिये ।।

ले लिए हैं वोट सारे आपने ।
काम भी कुछ तो हमारा कीजिये ।।

अब मुकर जाते हैं अपने, देखकर ।
अब खुदा का ही सहारा कीजिये ।।

दे रहीं हैं कुछ गवाही झुर्रियां ।
ज़ुल्फ़ इतनी मत सँवारा कीजिये ।।

गर बुढापे में जवां दिल की तलाश ।
हुस्न का भी इक नज़ारा कीजिये ।।

आपकी फितरत से भी वाकिफ हैं हम ।
शेखियाँ मत यूँ बघारा कीजिये ।।

हो गया है इश्क़ तो दिल में रहें ।
इस तरह तो मत किनारा कीजिये ।।

नवीन मणि त्रिपाठी
मौलिक अप्रकाशित

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Comment

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Comment by Samar kabeer on November 28, 2017 at 9:14pm
जनाब नवीन मणि त्रिपाठी जी आदाब,बहुत उम्दा ग़ज़ल है, बधाई स्वीकार करें ।

'ज़ुल्फ़ इतना मत सँवारा कीजिये'
इस मिसरे में 'ज़ुल्फ़'स्त्रीलिंग है, इसलिये 'इतना'को "इतनी" कर लें ।
'हुस्न पर भी इक नज़ारा कीजिये'
इस मिसरे को यूँ करें :-
'हुस्न का भी इक नज़ारा कीजिये'
'शैख़ियां अपनी बघारा कीजिये'
इस मिसरे को यूँ करें :-
'शैख़ियां मत यूँ बघारा कीजिये'
Comment by Naveen Mani Tripathi on November 28, 2017 at 4:34pm
आ0 आरिफ साहेब सादर आभार ।
Comment by Mohammed Arif on November 28, 2017 at 2:00pm
आदरणीय नवीन मणि जी आदाब,
बहुत ही उम्दा ग़ज़ल । हर शे'र उम्दा । हार्दिक बधाई स्वीकार करें । बाक़ी गुणीजन अपनी राय देंगे ।

कृपया ध्यान दे...

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