For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

दामन को तीरगी से बचाते चले गए - सलीम रज़ा रीवा

221 2121 1221 212 
दामन को तीरगी से बचाते चले गए
ईमाँ की रोशनी में  नहाते चले गए

 -
हम दर-बदर की ठोकरे खाते चले गए
फिर भी तराने प्यार के गाते चले गए
 -
कोशिश तो की भंवर ने डुबोने की बारहा
हम कश्ती-ए-हयात बचाते चले  गए

 -

रुसवाईयों के डर से कभी बज़्में नाज़ में
हंस-हंस के दिल का दर्द छुपाते चले गए

 -

अपना रहा ख़्याल न कुछ होश ही रहा
आँखों में उनकी हम तो समाते चले गए

 -

करता है जो सभी के मुक़द्दर का फ़ैसला
उसकी रज़ा की शम्अ जलाते चले गए

Views: 876

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by SALIM RAZA REWA on December 17, 2017 at 8:29pm
आपकी महब्बत के लिए शुक्रिया सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' जी.
Comment by SALIM RAZA REWA on December 17, 2017 at 8:28pm
बहुत शुक्रिया लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' जी
Comment by नाथ सोनांचली on December 11, 2017 at 4:49am

आद0 सलीम जी सादर अभिवादन, बेहतरीन और उम्दा ग़ज़ल कही आपने, शैर दर शैर बधाई देता हूँ। सादर

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on December 10, 2017 at 2:15pm

बहुत खूब । हार्दिक बधाई ।

Comment by SALIM RAZA REWA on December 8, 2017 at 7:48am

काली प्रसाद जी,

ग़ज़ल को सराहने के लिए आपका बहुत बहुत धन्यवाद, 

Comment by SALIM RAZA REWA on December 8, 2017 at 7:47am

आरिफ साहब, महब्बत सलामत रहे, 

Comment by SALIM RAZA REWA on December 8, 2017 at 7:46am

जनाब अफरोज साहब,

आपके ख़ुलूश और महब्बत के लिए शुक्रिया, 

Comment by SALIM RAZA REWA on December 8, 2017 at 7:45am

श्याम नारायण जी ग़ज़ल पर आपकी सराहना के लिए धन्यवाद, 

Comment by SALIM RAZA REWA on December 8, 2017 at 7:44am

जनाब तस्दीक़ अहमद साहब,

आपकी ग़ज़ल पर शिर्कत और आपकी महब्बत के लिए शुक्रिया, 

Comment by Kalipad Prasad Mandal on December 6, 2017 at 8:08pm

आ सलीम रज़ा साहिब आदाब , सभी अशआर बहुत सुन्दर है बधाई स्वीकार करें 

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

amita tiwari and आशीष यादव are now friends
23 hours ago
amita tiwari commented on amita tiwari's blog post प्यादे मान लिये जाते हैं मात्र एक संख्या भर
"मान्यवर  सौरभ पांडे जी , सार्थक और विस्तृत टिप्पणी के लिए आभार."
23 hours ago
amita tiwari commented on amita tiwari's blog post भ्रम सिर्फ बारी का है
"आशीष यादव जी , मेरा संदेश आप तक पहुंचा ,प्रयास सफल हो गया .धन्यवाद.पर्यावरण को जितनी चुनौतियां आज…"
23 hours ago
बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post हरकत हमें तो वैद की रखती तनाव में -लक्ष्मण धामी 'मुसफिर'
"आदरणीय धामी जी सारगर्भित ग़ज़ल कही है...बहुत बहुत बधाई "
yesterday
बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on Sushil Sarna's blog post दोहा पंचक. . . . संयोग शृंगार
"आदरणीय सुशील जी बड़े सुन्दर दोहे सृजित हुए...हार्दिक बधाई "
yesterday
अजय गुप्ता 'अजेय replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"प्रबंधन समिति से आग्रह है कि इस पोस्ट का लिंक उस ब्लॉक में डाल दें जिसमें कैलंडर डाला जाता है। हो…"
yesterday
आशीष यादव posted a blog post

गन्ने की खोई

पाँच सालों की उम्र,एक लोहे के कोल्हू में दबी हुई है।दो चमकदार धूर्त पत्थर (आंखें) हमें घुमा रहे…See More
yesterday
आशीष यादव commented on Sushil Sarna's blog post दोहा सप्तक. . . . घूस
"आदरणीय श्री सुशील जी नमस्कार।  बहुत अच्छे दोहे रचे गए हैं।  हार्दिक बधाई स्वीकार कीजिए।"
yesterday
आशीष यादव commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post घर के रिवाज चौक में जब दान हो गये -लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'
"एक बेहतरीन ग़ज़ल रचा है आपने। बिलकुल सामयिक।  इस बढ़िया रचना पर बधाई स्वीकार कीजिए।"
yesterday
आशीष यादव commented on amita tiwari's blog post भ्रम सिर्फ बारी का है
"सदियों से मनुष्य प्रकृति का शोषण करता रहा है, जिसे विकास समझता रहा है वह विनास की एक एक सीढ़ी…"
yesterday
आशीष यादव commented on Sushil Sarna's blog post दोहा पंचक. . . . .अधर
"वाह। "
yesterday
आशीष यादव commented on Sushil Sarna's blog post दोहा सप्तक. . . .विविध
"आदरणीय श्री सुशील जी नमस्कार।  बहुत बढ़िया दोहों की रचना हुई है।  बधाई स्वीकार कीजिए।"
yesterday

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service