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जीने के लिए ...

जाने
कितनी दुश्वारियों को झेलती
ज़िंदगी
रेंगती हसरतों के साथ
खुद भी
रेंगने लगती है
हर कदम
जीने के लिए
ज़ह्र पीती है
हर लम्हा
चिथड़े -चिथड़े होते
आरज़ूओं के
पैबंद सीती है
जाने कब
वक़्त
ज़िंदगी की पेशानी पर
बिना तारीख़ के अंत की
एक तख़्ती
लगा जाता है
उस तख़्ती के साथ
ज़िंदगी रोज
मरने के लिए
जीती है
और
जीने के लिए
मरती है

सुशील सरना
मौलिक एवं अर्पकाशित

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Comment

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Comment by vijay nikore on December 14, 2017 at 4:36pm

//जाने कब 
वक़्त 
ज़िंदगी की पेशानी पर 
बिना तारीख़ के अंत की 
एक तख़्ती 
लगा जाता है //......................

वाह, वाह, वाह ! बहुत ही सुन्दर भाव। रचना का आनन्द आ गया , आदरणीय सुशील जी।

Comment by Sushil Sarna on December 12, 2017 at 7:29pm

आदरणीय सुरेन्द्र नाथ सिंह जी सृजन के भावों को आत्मीय मान देने का दिल से आभार।

Comment by Sushil Sarna on December 12, 2017 at 7:29pm

आदरणीय रामबली गुप्ता जी सृजन को अपनी मधुर प्रतिक्रिया से सुशोभित करने का दिल से आभार।

Comment by रामबली गुप्ता on December 11, 2017 at 8:19pm

अतुकांत पर आपका प्रयास हमेशा शानदार होता है। हार्दिक बधाई स्वीकार करें। सादर

Comment by नाथ सोनांचली on December 11, 2017 at 5:02am

आद0 सुशील सरना जी सादर अभिवादन। बेहतरीन और उम्दा रचना, बधाई आपको।

Comment by Sushil Sarna on December 8, 2017 at 6:49pm



आदरणीय कालीपद जी सृजन के भावों अपनी स्नेहिल प्रतिक्रिया से अलंकृत करने का दिल से आभार।

Comment by Sushil Sarna on December 8, 2017 at 6:49pm


आदरणीय समर कबीर साहिब, आदाब ... प्रस्तुति के भावों को स्नेहाशीष से उत्साहित करने का दिल से आभार।

Comment by Kalipad Prasad Mandal on December 6, 2017 at 7:42pm

आ सुशील सरना जी ,आँख मिचौनी खेलती जिंदगी के ऊपर बहुत सुन्दर कविता के लिए बधाई स्वीकार करें 

Comment by Samar kabeer on December 6, 2017 at 6:53pm

जनाब सुशील सरना जी आदाब,बहुत उम्दा और सुंदर कविता,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।

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