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एक कार आकर रज़ाई बनाने वाले की दुकान के आगे खड़ी हुयी । कार के पिछले दरवाजे से साहबनुमा व्यक्ति बाहर निकला । दुकान वाले की बांछें खिल गईं । भला कौन इस तरह उसकी दुकान पर इतनी बड़ी गाड़ी लेकर आता है ।

दुकानदार से उन्मुख होते हुए साहब ने छोटे साइज़ के रज़ाई, गद्दा, तकिया और चद्दर दिखने को कहा । दुकानदार ने सोचा साहब को अपने छोटे बच्चे के लिए ये सब चाहिए, सो बड़े उत्साह से चीजें दिखने लगा । पर साहब ने बताया कि उन्हें ये सब समान अपने "डौगी" के लिए लेना है । दुकानदार बड़ी फुर्ती से उन्हें छोटे साइज़ के गद्दे तकिये, रज़ाई और चद्दर दिखने लगा । दिखाये गए समान में से छांट कर साहब ने एक-एक रज़ाई, गद्दा, तकिया और चद्दर पसंद किया और पैसे चुका कर दुकान वाले से सारा समान कार में रखने को कहकर खुद कार में सवार होने के लिए उन्मुख हुए । तभी सामने से चिथड़ों में लिपटा, ठंढ से काँपता, छड़ी के सहारे से चलता हुआ एक भिखारी सामने आ खड़ा हुआ "साहब, एक ठो चद्दर दिला दीजिये । बड़ी जाड़ा पड़ रहा है ।"

 साहबनुमा व्यक्ति को यूं अपना रास्ता रोका जाना अच्छा नहीं लगा । बुरा सा मुंह बनाते हुए उसने भिखारी को दुतकार दिया और अपने "डौगी" का बिस्तर गाड़ी में रखवा कर रवाना हो गए।

 

भला भिखारी के "डौगी" जैसे भाग्य कहाँ ।  

 

.... मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by pratibha pande on December 11, 2017 at 1:50pm

बढिया लघुकथा आदरणीया नीलम जी बधाई स्वीकार करें। आदरणीय सोमेश जी की बात से सहमत हूँ अंतिम पंक्ति के बिना भी कहानी कथ्य संप्रेषण मे सफल है

Comment by Neelam Upadhyaya on December 11, 2017 at 9:46am
अदरणीय समर कबीर जी एवं अदरणीय रक्षिता जी, लघु कथा पसंद करने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद ।
Comment by Neelam Upadhyaya on December 11, 2017 at 9:43am
अदरणीय सोमेश जी, बहुत बहुत धन्यवाद । आइंदा भी आप के मार्गदर्शन की आवश्यकता रहेगी ।
Comment by Neelam Upadhyaya on December 11, 2017 at 9:41am
अदरणीय उस्मानी जी, मार्गदर्शन के लिए बहुत आभार । आइंदा भी आप के मार्गदर्शन की आकांक्षी रहूँगी ।
Comment by Sheikh Shahzad Usmani on December 10, 2017 at 5:50pm

 तथाकथित आधुनिक रईस लोगों की एक मानसिकता को चित्रित करती बढ़िया भावपूर्ण रचना के लिए हार्दिक बधाई आदरणीया  Neelam Upadhyaya  जी। मैं आदरणीय सोमेश कुमार जी की टिप्पणी से सहमत हूं। इस पंक्ति की आवश्यकता नहीं लगती। 

इसी प्रकार भाव पुनरावृत्ति वाली वाक्यांश // और अपने "डौगी" का बिस्तर गाड़ी में रखवा कर// को हटाया जा सकता है। दुतकारता तो प्राय: हर कोई है। अंत में उस भिखारी या दुकानदार का तीखा संवाद जोड़ा जा सकता है। /डौगी= डॉगी/

Comment by somesh kumar on December 10, 2017 at 3:48pm

भला भिखारी के "डौगी" जैसे भाग्य कहाँ 

मेरे विचार में बिना निष्कर्ष के भी लघुकथा अपनी बात कहने में सफल है |

रचना के लिए बधाई 

Comment by रक्षिता सिंह on December 8, 2017 at 1:26am

आदरणीय, नीलम जी

दिल को छू लेने वाली बहुत ही सुन्दर लघुकथा।

बहुत बहुत बधाई।

Comment by Samar kabeer on December 7, 2017 at 10:11pm

मोहतरमा नीलम उपाध्याय जी आदाब,सुंदर प्रस्तुति हेतु बधाई स्वीकार करें ।

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