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ख़ुद से ये शर्मशार सा क्यों है (ग़ज़ल)

अरकान-: 2122  1212  22

ख़ुद से ये शर्मसार सा क्यों है

आदमी बेक़रार सा क्यों है 

मेरे दिल ने सवाल ये पूछा,

नेता हर इक गंवार सा क्यों है

आने वाले नहीं हैं अच्छे दिन,

फिर हमें इन्तिज़ार सा क्यों है

मैंने कुछ भी नहीं छुपाया फिर

तुझमें ये इंतिशार सा क्यों है 

मैंने जब माँग ली मुआफ़ी,फिर

उनके दिल में ग़ुबार सा क्यों है 

उसकी फ़ितरत से ख़ूब वाक़िफ़ हैं,

'फिर हमें एतिबार सा क्यों है'

उम्र भर मौज की बहुत हमने,

पर बुढ़ापा ये भार सा क्यों है

(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment

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Comment by नादिर ख़ान on December 26, 2017 at 6:47pm

अच्छी ग़ज़ल हुयी है आदरणीय सुरेंद्र नाथ जी। ..
वैसे तो हर किसी की लेखन की अपनी शैली होती है। .. मुझे ये अच्छा लगा इसलिए साझा कर रहा हूँ
हर कोई बेकरार सा क्यूँ है
खुद से ही शर्मसार सा क्यूँ है

...
.....
उम्र भर मौज की बहुत हमने,
अब बुढ़ापे में भार सा क्यूँ है।

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