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भुइंया लोग विजय-पर्व मना रहे थे।यह उनकी पुरातन परंपरा का हिस्सा था।उनके पूर्वजों ने कभी अपने पूर्वाग्रह ग्रस्त मालिकों को बुरी तरह पराजित किया था। तब से यह दिन भुइंया समुदाय के लिए उत्साह और उत्सव का पर्याय बन गया था। 'जई हो,जई हो',की तुमुल ध्वनि गूँजने लगी।यह उनके उत्सव के उत्कर्ष की स्थिति थी।ढ़ोल, नगाड़े,तुरही सब के बोल चरम पर थे। झंकार ऐसी कि मुर्दे भी स्पंदित हो जायें, नृत्य करने लगें। पर,यह क्या?अचानक भगदड़ -सी होने लगी।किसी के सिर से लहू के फव्वारे निकल पड़े।कहीं से किसी ने पत्थर उछाल दिये थे।कुछ लोगों के सर फूट गये थे। फिर क्या था,रगेदा-रगेदी शुरू हो गयी।बच्चे-बूढ़े भी उस भागमभाग में घायल हुए।पुलिस ने ले-देकर मामला शांत कराया।अब रोज ही शहर बंद और प्रदर्शन के कब्जे में रहने लगा है।
-यह कबतक चलेगा'?मैंने राहगीर से पूछा।
-‎पता नहीं भइये।लंबा भी जा सकता है',उसने बिना मेरी तरफ देखे ही कहा।
-‎क्यूँ?
-‎क्यूँ क्या?आग जोर की लगी है।जल्दी बुझेगी नहीं।
-‎कैसी आग भाई?
-‎पैसे की बाबू',अबकी बार उसने मेरी तरफ देखा।शायद तहकीकात करना चाहता था कि मैं कौन हूँ।
-‎कैसे पैसे भाई?मैंने कुरेदा।
-‎कुर्सी वाले कुर्सी बचाने में खरचते हैं,बाहर वाले कुर्सी हिलाने में।इसी बचाने-हिलाने में लोग कटते-मरते हैं
-‎ओह।
-‎मेरे समुदाय वालों ने विरोधियों के दो-चार लोगों की पिटाई की,एक मरा भी है।छिपते-छिपाते घर जा रहा हूँ',वह आश्वस्त हो चुका था कि मैं इन झमेलों से दूर का हूँ।
-‎अच्छा',मैंने कहा और आगे बढ़ गया।
-‎बाबू टोले की तरफ से मत जाना भाई',वह राहगीर चिल्लाया,'उनके माथे पर अभी खून सवार है।गलती से ही सही,उनका  एक आदमी शहीद हो गया है।'
मेरे मित्र ने अपनी बंद-यात्रा-कथा सुनाई।
"मौलिक व अ प्र का शि त"

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Comment by नाथ सोनांचली on January 4, 2018 at 2:10pm

आद0 मनन कुमार जी सादर अभिवादन। सामयिकता का पुट लिए बढ़िया कघुकथा, यह भी सच है कि इस तरह की अधिकतर घटनाएं राजनीति से प्रेरित होती हैं पर इसमें आज कल सोशल मीडिया पर उड़ती अपवाह भी जिम्मेदार हैं। इस प्रस्तुति पर आपको बहुत बहुत बधाई।

Comment by Sheikh Shahzad Usmani on January 4, 2018 at 9:45am

वाह साहिब। नये साल के आग़ाज़ पर समसामयिक घटनाचक्र पर इशारों में बेहतरीन यथार्थपूर्ण कटाक्षपूर्ण सृजन के लिए तहे दिल से बहुत-बहुत मुबारकबाद मुहतरम जनाब मनन कुमार सिंह जी। मेरे विचार से लघुकथा इस बेहतरीन विचारोत्तेजक पंक्ति पर सम्पन्न हो जाती है :‎कुर्सी वाले कुर्सी बचाने में खरचते हैं,बाहर वाले कुर्सी हिलाने में।इसी बचाने-हिलाने में लोग कटते-मरते हैं//... इसके बाद के संवादों को इसके ही पहले ऊपरी भाग में समायोजित किया जा सकता है या फिर हटाया जा सकता है। इस बार आप संवादों में इन्वर्टेड क़ौमाज़ लगाना भूल गए हैं। आपकी बेहतरीन लघुकथाओं से नवीन कथानकों पर लिखने की प्रेरणा मिल रही है व मार्गदर्शन भी। हार्दिक आभार। मंच पर अन्य रचनाओं का अवलोकन कर उन पर अपनी महत्वपूर्ण टिप्पणियों से हम सभी को लाभान्वित भी कीजिएगा। सादर।

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