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हौसलों की बैसाखी से
हर मंज़िल को पार किया है
दया-सहानुभूति को
हरदम दर किनार किया है
जब-जब घिरे बादल विपत्ति के
बिजलियाँ चमकीं विचलन की
ख़ुद को मैंने धारदार किया है
बाधाओं को परास्त करता गया
बीज सफलता के बोता गया
भय के काँटों को लाचार किया है
गिरा नहीं , लड़खड़ाया नहीं
इरादा कभी मेरा डगमगाया नहीं
जीवन सुनामी को पार किया है
किया सदैव साहस का आलिंगन
धैर्य का उपवन सजाया है
संघर्षों का मैंने श्रृंगार किया है ।
मौलिक एवं अप्रकाशित ।

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Comment by Mohammed Arif on February 2, 2018 at 10:31pm

बहुत -बहुत आभार आदरणीय बृजेश कुमार जी ।

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on February 2, 2018 at 9:57pm

बड़ी ही अच्छी और सार्थक कविता हुई आदरणीय आरिफ जी..सादर

Comment by Mohammed Arif on February 2, 2018 at 8:24am

रचना पर दो-दो प्रतिक्रिया देकर मान बढ़ाने और हौसला अफज़ाई का बहुत-बहुत आभार आदरणीय विजय निकोर जी ।

Comment by Mohammed Arif on February 2, 2018 at 8:22am

बहुत-बहुत शुक्रिया आदरणीय तस्दीक़ अहमद जी । 

Comment by Mohammed Arif on February 2, 2018 at 8:21am

हौसला अफज़ाई का बहुत-बहुत शुक्रिया आली जनाब मोहतरम समर कबीर साहब । आपकी इस्लाह सर आँखों पे ।

Comment by vijay nikore on February 1, 2018 at 10:10pm

//हौसलों की बैसाखी से
हर मंज़िल को पार किया है//

यह भाव बहुत ही छू गया। आपकी कविताओं में आकृषण है... । प्रतिक्रिया दे चुका था, सोचा यह भी कह दूँ।

Comment by Tasdiq Ahmed Khan on February 1, 2018 at 8:58pm

मुहतरम जनाब आरिफ साहिब आदाब , बहुत ही सुन्दर कविता हुई है ,मुबारकबाद क़ुबूल फरमाएं।

Comment by vijay nikore on February 1, 2018 at 3:03pm

अति सुन्दर रचना..आन्नद आ गया। हार्दिक बधाई, भाई मोहम्मद आरिफ़ जी।

Comment by Samar kabeer on February 1, 2018 at 2:41pm

जनाब मोहम्मद आरिफ़ साहिब आदाब,बहुत उम्दा कविता लिखी आपने,इस प्रस्तुति पर दिल से बधाई स्वीकार करें ।

छटी पंक्ति में 'चमकी' को "चमकीं" कर लें ।

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