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उसने कहा 2=3 होता है

 

मैंने कहा आप बिल्कुल गलत कह रहे हैं

 

उसने लिखा 20-20=30-30

फिर लिखा 2(10-10)=3(10-10)

फिर लिखा 2=3(10-10)/(10-10)

फिर लिखा 2=3

 

मैंने कहा शून्य बटा शून्य अपरिभाषित है

आपने शून्य बटा शून्य को एक मान लिया है

 

उसने कहा ईश्वर भी अपरिभाषित है

मगर उसे भी एक माना जाता है

 

मैंने कहा इस तरह तो आप हर वह बात सिद्ध कर देंगे

जो आपके फायदे की है

 

उसने कहा यह बात मैं जानता हूँ

तुम जानते हो

मगर जनता यह बात नहीं जानती

और तुम जनता को यह बात समझा नहीं पाओगे

 

इतना कहकर वह मुस्कुराया

मैं निरुत्तर हो गया।

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

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Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on April 11, 2018 at 2:37pm

बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय लक्ष्मण धामी जी

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on April 11, 2018 at 2:37pm

बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय समर कबीर साहब

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on April 11, 2018 at 2:36pm

बहुत बहुत धन्यवाद आदरणीय सुरेन्द्र नाथ सिंह जी

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 4, 2018 at 6:32pm

आ.भाई धर्मेंद्र जी, अच्छी रचना हुई है हार्दिक बधाई ।

Comment by Samar kabeer on February 3, 2018 at 7:12pm

जनाब धर्मेन्द्र जी आदाब,सुंदर प्रस्तुति हेतु बधाई स्वीकार करें ।

Comment by नाथ सोनांचली on February 3, 2018 at 1:10pm

शून्य बटा शून्य अपरिभाषित है,इसे केन्क्ले करके एक कतई नहीं लिखा जा सकता। अब रही ईश्वर से इसे सम्बन्ध स्थापित करने की तो मेसेज बड़ा हो जाएगा। सादर

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