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एक गाँव में कुछ लोग ऐसे थे जो देख नहीं पाते थे, कुछ ऐसे थे जो सुन नहीं पाते थे, कुछ ऐसे थे जो बोल नहीं पाते थे और कुछ ऐसे भी थे जो चल नहीं पाते थे। उस गाँव में केवल एक ऐसा आदमी था जो देखने, सुनने, बोलने के अलावा दौड़ भी लेता था। एक दिन ग्रामवासियों ने अपना नेता चुनने का निर्णय लिया। ऐसा नेता जो उनकी समस्याओं को जिलाधिकारी तक सही ढंग से पहुँचा कर उनका समाधान करवा सके।

जब चुनाव हुआ तो अंधों ने अंधे को, बहरों ने बहरे को, गूँगों ने गूँगे को और लँगड़ों ने एक लँगड़े को वोट दिया। जो आदमी देख, सुन, बोल और दौड़ सकता था उसे केवल अपना ही वोट मिल सका। गाँव में अंधों की संख्या ज्यादा थी इसलिये एक ऐसा आदमी नेता बन गया जिसे कुछ भी दिखाई नहीं पड़ता था।

अंधा गाँव के इकलौते देख, सुन, बोल और दौड़ सकने वाले आदमी को लेकर जिलाधिकारी के पास गया और बोला, “हुजूर, माईबाप गाँव के सभी आदमियों एवं जानवरों के गले में घंटी बँधवा दीजिये और सभी वृक्षों और दीवारों में ऐसा सायरन लगवा दीजिये जो किसी के नजदीक आते ही बज उठे। इससे सारे ग्रामवासी बेधड़क सारे गाँव में घूम सकेंगे और अपना-अपना काम आराम से कर सकेंगे।”

जिलाधिकारी का दिमाग भन्ना गया। वह इकलौते देख, सुन, बोल और दौड़ सकने वाले आदमी से बोला, “यह क्या पागलपन है।”

आदमी बोला, “हुजूर यह लोकतंत्र है।”

--------------

मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on April 11, 2018 at 2:35pm

बहुत बहुत धन्यवाद आदरणीय बृजेश कुमार 'ब्रज' जी

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on April 11, 2018 at 2:35pm

बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय रवि प्रभाकर जी

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on April 11, 2018 at 2:34pm

जनाब Sheikh Shahzad Usmani साहब मैं स्वयं ओबीओ मंच पर लघुकथा का विद्यार्थी हूँ। अभी तक केवल आठ-दस लघुकथाएँ ही लिख पाया हूँ जो यहाँ ओबीओ पर ही मौज़ूद हैं। लघुकथा की सराहना के लिये तह-ए-दिल से आपका शुक्रगुजार हूँ।

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on April 11, 2018 at 2:32pm

बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय लड़ीवाला जी

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on April 11, 2018 at 2:32pm

बहुत बहुत शुक्रिया जनाब समर कबीर साहब

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on April 11, 2018 at 2:31pm

बहुत बहुत धन्यवाद आदरणीय गोपाल नारायण जी

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on April 11, 2018 at 2:31pm

बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय तेजवीर सिंह जी

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on April 8, 2018 at 1:38pm

वाह आदरणीय क्या शानदार कटाक्ष किया है..वाकई में लोकतंत्र आजकल बड़ा दुखदाई प्रतीत हो रहा है...

Comment by Ravi Prabhakar on April 7, 2018 at 9:04pm

वाह! बहुत ही सधी और शानदार लघुकथा है भाई धर्मेन्‍द्र जी । आपकी कल्‍पना शक्‍ित की दाद देता हूं भाई जी । लघुकथा का शीर्षक ही सब कुछ बयां कर रहा है । बधाई स्‍वीकार करें ।

Comment by Sheikh Shahzad Usmani on April 6, 2018 at 10:02pm
  • गांव/लोकतंत्र और जनता अंधे/गूंगे/बहरे /पूरी तरह से स्वस्थ दौड़ सकने वाले के प्रतीकों/बिम्बों में दिग्भ्रमित देशवासियों और दिग्भ्रमित प्रशासकों पर गहरे कटाक्ष करती मार्गदर्शक सृजन के लिए तहे दिल से बहुत-बहुत मुबारकबाद और आभार आदरणीय धर्मेंद्र कुमार सिंह जी। आपकी अन्य लघुकथाएं/संग्रह पढ़ कर अध्ययन करना और सीखने की कोशिश करना चाहता हूं। सादर।

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