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ग़ज़ल : बरसेगा तेज़ाब एक दिन बादल से

बह्र : २२ २२ २२ २२ २२ २

आह निकलती है यह कटते पीपल से

बरसेगा तेज़ाब एक दिन बादल से

 

माँगे उनसे रोज़गार कैसे कोई

भरा हुआ मुँह सबका सस्ते चावल से

 

क़ै हो जाएगी इसके नाज़ुक तन पर

कैसे बनता है गर जाना मखमल से

 

गाँव, गली, घर साफ नहीं रक्खोगे गर

ख़ून चुसाना होगा मच्छर, खटमल से

 

थे चुनाव पहले के वादे जुम्ले यदि

तब तो सत्ता पाई है तुमने छल से

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

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Comment by Balram Dhakar on October 31, 2018 at 12:04am

बहुत अच्छी ग़ज़ल हुई है, आदरणीय धर्मेंद्र जी।

हार्दिक बधाई आपको।

सादर।

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on February 1, 2018 at 3:26pm
बहुत बहुत धन्यवाद आदणीय समर साहब, जनाब मोहम्मद आरिफ़ साहब और डाक्टर आशुतोष मिश्र जी
Comment by Samar kabeer on November 12, 2017 at 5:20pm
अच्छी रचना,बधाई आपको ।
Comment by Mohammed Arif on November 12, 2017 at 7:53am
आदरणीय धर्मेंद्र कुमार जी आदाब, बहुत ही सामयिक ग़ज़ल । हर शे'र उम्दा । हार्दिक बधाई स्वीकार करें । बाक़ी गुणीजन अपनी राय देंगे ।
Comment by Dr Ashutosh Mishra on November 11, 2017 at 5:41pm

वर्तामान संदर्भो का चित्रण करती..खतरों की चेतावनी देते और शानदार मशविरो से ओतप्रोत इस शानदार ग़ज़ल के लिए ढेर सारी बधाई भाई धर्मेन्द्र जी  सादर

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