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ग़ज़ल....मेरी आँखें और जयादा नम हो जातीं हैं-बृजेश कुमार 'ब्रज'

22     22     22    22    22    22    2
जब भी तेरी यादें जानां कम हो जाती हैं
मेरी आँखें और जियादा नम हो जाती हैं

दर्द संभालूँ आहें रोकूँ दिल को समझाऊँ
अश्क़ों की बरसातें बेमौसम हो जाती हैं

राह तुम्हारी तकते तकते आँखें पथराईं
साँसें भी चलते चलते मद्धम हो जाती हैं

रफ़्ता रफ़्ता रात चली और सवेरा आया
फिर ये होता है सोचें बरहम हो जाती हैं

उस दर पे दम तोड़ गई हर एक सदा मेरी
और सभी उम्मीदें 'ब्रज' बेदम हो जाती हैं
(मौलिक एवं अप्रकाशित)
बृजेश कुमार 'ब्रज'

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Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on February 9, 2018 at 7:56pm

बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय आरिफ जी...

Comment by Mohammed Arif on February 9, 2018 at 5:51pm

आदरणीय बृजेश कुमार जी आदाब,

                    शे'र दर शे'र दाद के साथ मुबारकबाझ क़ुबूल करें । बाक़ी गुणीजन अपनी राय देंगे ।

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on February 9, 2018 at 5:48pm

बहुत बहुत आभार आदरणीया रक्षिता जी...

Comment by रक्षिता सिंह on February 8, 2018 at 11:40pm

आदरणीय बृजेश जी, बहुत ही खूबसूरत पंक्तियाँ....

बहुत बहुत बधाई।

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