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ग़ज़ल...न जाने कैसे गुजरेगी क़यामत रात भारी है-बृजेश कुमार 'ब्रज'

1222 1222 1222 1222
अभी ये आँखें बोझिल है निहाँ कुछ बेक़रारी है
न जाने कैसे गुजरेगी क़यामत रात भारी है

सितारो क्यों परेशां हो अगर है चाँद पोशीदा
तुम्हारी जाँ-फ़िशानी से उदासी हर सू तारी है

चरागों सा जले फिर भी अँधेरा कम नहीं होता
धुआँ बनके बिखर जाएं यही किस्मत हमारी है

ये अक्सर नाक पर लेकर अना जो घूमते हो तुम
कहीं से मांग कर लाये हो या सच में तुम्हारी है 

गुजारी ज़िन्दगी कैसे बताएं किस तरह अय 'ब्रज'
हमारी मुश्किलों से ही अभी तक जंग जारी है

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

बृजेश कुमार 'ब्रज'

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Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on February 22, 2018 at 6:05pm

बिलकुल आदरणीय सुरेन्द्र जी..बहुत बहुत आभार

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on February 22, 2018 at 6:04pm

ज़नाब तस्दीक साहब ग़ज़ल पे शिरक़त के लिए आभार..चौथे शेर के सानी को यूँ करता हूँ

"कहीं से मांग कर लाये हो या सच में तुम्हारी है " बताइयेगा।

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on February 22, 2018 at 6:01pm

शुक्रिया आदरणीय रामबली गुप्ता जी..

Comment by नाथ सोनांचली on February 22, 2018 at 2:18pm
आद0 बृजेश कुमार ब्रज जी सादर अभिवादन। ग़ज़ल पर बढिया कोशिस।हार्दिक बधाई आपको
शेष गुणीजनों की बातों का संज्ञान लीजियेगा। सादर
Comment by Tasdiq Ahmed Khan on February 22, 2018 at 1:24pm

जनाब ब्रजेश साहिब ,ग़ज़ल का अच्छा प्रयास हुआ है ,मुबारकबाद क़ुबूल फरमाएं ।  मुहतर्मा राजेश साहिबा और मुहतरम जनाब समर साहिब के मश्वरे पर ध्यान दें । शेर 4 का सानी मिसरा यूँ करके देखिए "मियां ये मांग कर लाये कहीं से या तुम्हारी है "।

Comment by रामबली गुप्ता on February 22, 2018 at 11:59am

ग़ज़ल पर बढियाँ प्रयास हुआ है भाई बृजेश कुमार जी। हार्दिक बधाई स्वीकारें।सादर

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on February 21, 2018 at 10:18pm

थोड़ा बहुत समझ रहा हूँ आदरणीय समर कबीर जी..कोशिश करता हूँ कुछ बदलाव कर सकूँ।तहेदिल से शुक्रिया आपका..

Comment by Samar kabeer on February 21, 2018 at 4:03pm

जनाब बृजेश कुमार 'ब्रज'साहिब आदाब,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है,बधाई स्वीकार करें ।

बहना राजेश कुमारी जी की बातों का संज्ञान लें ।

'मियाँ ये आपकी है या कहीं से ली उधारी है'

इस मिसरे में 'उधारी' क़ाफ़िया काम नहीं कर रहा है,इस मिसरे की नस्र(गद्ध)बनाकर पढ़ें तो जुमला यूँ होगा,'मियाँ ये आपकी है या कहीं से उधार ली है,उम्मीद है आप समझ रहे होंगे?

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on February 21, 2018 at 3:49pm

शुक्रिया आदरणीया 'चरागों सा जला' मुझे भी खटक रहा था..आपने बात साफ कर दी..आपका हार्दिक अभिनन्दन है..


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on February 20, 2018 at 10:31pm

अच्छी ग़ज़ल कही है बहुत बहुत बधाई

अभी ये आँख बोझिल है निहाँ कुछ बेक़रारी है---अभी आँखें ये बोझिल हैं --कर  सकते हो  वरना लग रहा है एक ही आँख बोझिल है 
न जाने कैसे गुजरेगी क़यामत रात भारी है

चरागों सा जला फिर भी अँधेरा कम नहीं होता
धुआँ बनके बिखर जाएं यही किस्मत हमारी है---उला में जला सानी में जाएँ व् हमारी ---शुतुर्गुबा दोष आ गया 

चरागो से जले फिर भी --कर लीजिये --और कोई आप्शन नहीं है 

ये अक्सर नाक पर लेकर अना जो घूमते हो तुम
मियां ये आपकी है या कहीं से ली उधारी है-----वाह्ह्ह

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