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कहा गया है कि,
साईं इतना दीजिए जा मै कुटुम समाय।
मै भी भूखा न रहूं , साधु न भूखा जाय।।
उनका भी यही हाल था न संपन्न थे न विपन्न , मगर कुलीन थे, तो कुल की पगड़ी के बोझ से उनका सर इस अर्थयुग में हमेशा झुका ही रहता था ।
कुलीन लोगों की तरह उनकी नाक भी बहुत सख्त थी । इतनी सख्त की एकदिन उन्होंने नाक मारकर दिनेश ताँती की बेटी का सर फोड़ दिया था । जिसका उनके भाई को आज भी गम है।
फिर एकदिन उनकी नाक पर बेटी आ बैठी । सख्त नाक बेटी के बोझ से झुकने लगी , इतना कि कभी भी टूटकर गिर सकता था।
अर्थाभाव में ऐसे ही सर झुका रहता था ऊपर से नाक भी झुकने लगी थी ऐसे में दिमाग का संतुलन बिगड़ने लगा था ।
विपरीत समय में अपने गम को भूलकर भाई ने ही साथ दिया। आकर कंधे पर हाथ रखा और फिर उन्होंने तत्काल नाक कटा डाली ।
अब वह सर उठाकर चलते हैं आश्चर्य जिस कुल की चिंता में वह घुले जा रहे थे वह न दुख में न रोने आया न सुख में हँसने ।
अब उन्हें इस बात की चिंता भी नहीं है उन्होंने नये कुल की स्थापना कर दी है । बस भाई के सामने आने पर नजरें चुरा लेते हैं ।

मौलिक और अप्रकाशित

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Comment by Dr Ashutosh Mishra on February 23, 2018 at 11:33am

भाई कुमार गौरव जी बहुत ही बढ़िया कताक्ष् है इस रचना में प्रस्तुतीकरण बहुत भाया काबिले तारीफ़ इस रचना पर ह्रदय से बधाई सादर 

Comment by नाथ सोनांचली on February 22, 2018 at 6:13pm

आद0 कुमार गौरव जी सादर अभिवादन। बढिया लघुकथा कही आपने। बधाई स्वीकार कीजिये। सादर

Comment by KALPANA BHATT ('रौनक़') on February 21, 2018 at 7:18pm

बहुत बढ़िया कटाक्ष| हार्दिक बधाई इस बेहतरीन लघुकथा के लिए आ कुमार गौरव जी| 

Comment by Kumar Gourav on February 21, 2018 at 5:54pm
Mohammad Arif साहब , sheikh Shahzad Usmani साहब , Nita kasar जी , Samar Kabeer साहब हौसला अफजाई के लिए आप सभी का दिली शुक्रिया ।
Comment by Samar kabeer on February 21, 2018 at 5:50pm

जनाब कुमार गौरव जी आदाब,बहतरीन लघुकथा,इस प्रस्तुति पर दिल से बधाई स्वीकार करें ।

Comment by Nita Kasar on February 21, 2018 at 4:36pm

भाई का हाथ,और साथ ने नाक की परवाह से मुक्त कर दिया उम्दा कथा के लिये बधाई आद० कुमार गौरव जी ।

Comment by Sheikh Shahzad Usmani on February 20, 2018 at 11:49pm

बहुत ही उम्दा कटाक्षपूर्ण रचना। हार्दिक बधाई आदरणीय कुमार गौरव जी।

Comment by Mohammed Arif on February 20, 2018 at 8:51pm

वाह! वाह!! बहुत ही बेहतरीन और कटाक्षपूर्ण लघुकथा । मज़ा आ गया इस लघुकथा को पढ़कर । सच है, जिस नाक को लेकर चला जाता है या जिन आदर्शों को लेकर हम जीवन यापन करने की कोशिश करते हैं वो आदर्श परिस्थितियों के आगे घुटने टेक देते हैं । सारे आदर्श धराशायी हो जाते हैं ।

                     ओबीओ मंच पर आपका स्वागत हैं क्योंकि मैं पहली बार आपकी रचना से संवाद कर रहा हूँ । सशक्त लघुकथा के लिए हार्दिक बधाई स्वीकार करें ।

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