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कोई चाभे खूब मलाई,कोई रोटी-नून।
सभी बराबर भारत में हैं,फिर क्यों चूसें खून।
कोई ऋण ले चंपत होता,कोई देता जान।
कलम बताने वाली मेरी, कैसा हिंदुस्तान।।

पीयूष कुमार द्विवेदी 'पूतू'

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Comment by Mohammed Arif on February 22, 2018 at 6:50pm

आदरणीय पीयूष द्विवेदी जी आदाब,

                             सरसी छंद का अच्छा प्रयास । हार्दिक बधाई स्वीकार करें ।

                          आली जनाब मोहतरम समर कबीर साहब की इस्लाह का तत्काल प्रभाव से संज्ञान लें ।

Comment by Samar kabeer on February 22, 2018 at 6:16pm

जनाब पीयूष जी आदाब, सरसी छन्द का प्रयास अच्छा है,बधाई लीजिये ।

पहली पंक्ति में'कोई चाभे दूध मलाई',क्या दूध भी चाभा जाता है,दूसरी बात मेरे नज़दीक 'नून' के साथ 'क़ानून' की तुकान्तता सही नहीं है ।

Comment by Shyam Narain Verma on February 22, 2018 at 5:45pm
क्या बात है, हार्दिक शुभकामनाएं l सादर
Comment by पीयूष कुमार द्विवेदी on February 22, 2018 at 5:36pm

हार्दिक आभार आदरणीय

Comment by रामबली गुप्ता on February 22, 2018 at 2:13pm

मारक सरसी हुए हैं दोनों हार्दिक बधाई स्वीकारें। सादर

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