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दरिया में गोलमाल (लघुकथा)

 वैश्वीकरण और अंतरराष्ट्रीय व्यापार के दौर में स्वार्थपरक  समझौतों और गतिविधियों के ज़रिये  एक-दूसरे की 'नेकी' और 'दरिया' नये रूप में परिभाषित हो रहे थे। चर्चा चल रही थी :

विकसित देश (विकासशील देश से) - "नेकी कर दरिया में डाल। हम आपके दोस्त हैं!"

विकासशील देश (अपने नेताओं, व्यापारियों और उद्योगपतियों से) - "घोटाले कर और विदेश (दोस्त) में डाल। हम कर्ज़दार हैं।"

नेता, व्यापारी और उद्योगपति (अपने सत्ताधारी राजनैतिक दल से) - "हमसे ले, फिर हमको ही मनचाहा दे और चुप रह। तुम पर मेरे अहसान हैं।"

सत्ताधारी राजनैतिक दल (उन सब से) - "नेकी कर, दरिया में डाल। हम सदैव तुम सब पर मेहरबान हैं।"

(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment by Sheikh Shahzad Usmani on February 28, 2018 at 4:40am

मेरी इस रचना पर समय देकर अनुमोदन और हौसला अफ़ज़ाई के लिए तहे दिल से बहुत-बहुत शुक्रिया मुहतरम जनाब समर कबीर साहिब।

Comment by Samar kabeer on February 25, 2018 at 9:29pm

जनाब शैख़ शहज़ाद उस्मानी जी आदाब,कम शब्दों में शानदार लघुकथा,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।

कृपया ध्यान दे...

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