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गर बचेगा कुछ मिरा वो शाइरी ओर नेकियां...


बह्र:-2122-2122-2122-212

  बढ़ गई जिस दौर रिश्तों की नमीं और दूरियां ।।
खुद-ब-खुद लेनी पड़ी खुद को खुद की सेल्फियां।।

जिसको समझा शान आखिर अब वो आ कर के खड़ा ।।
    मुँह चिढ़ाता दौर मेरा ,खुद -जनी नाकामियां।।

  नाम अब है गर्व का ,खुदग़रज ओऱ बे अदब।
  झुकना अब न चाहता हैं नवजवां कोई मियां।।

देश के होने लगे जब मज़हबी हालात यूँ।।
राजनीतिक सेंकने लगते हैं अपनी रोटियां।।

  रास्ता सबका अलग, अब बँट ही जाना है हमें।
आ चलें कुछ दूर संग यादों की लेकर झलकियां।।

है पता तुमको भी मैं न भूल पाऊंगा तुम्हे ।
इश्किया यादें मुझे देती रहेगी झाप्पियां।।

कण हवाओं में यूँ गुम हो जाएंगे इस जिस्म के।
गर बचेगा कुछ मेरा ,वो शाइरी ओऱ नेकियां।।

आमोद बिंदौरी /मौलिक-अप्रकाशित

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Comment by नाथ सोनांचली on March 20, 2018 at 7:42pm

आद0 आमोद जी सादर अभिवादन। ग़ज़ल का बढिया प्रयास पर जैसा आद0 समर साहब ने कहा, अभी शिल्प पर मिहनत करनी है। आप ओ बी ओ पर ग़ज़ल की कक्षा का लाभ उठावें सादर

Comment by बसंत कुमार शर्मा on March 19, 2018 at 1:21pm

बहुत खूब 

Comment by Ajay Kumar Sharma on March 18, 2018 at 12:16pm

बहुत सुन्दर गजल.

बधाई स्वीकार करें..

Comment by Mohammed Arif on March 18, 2018 at 10:57am

आदरणीय आमोद जी आदाब,

                           अच्छी ग़ज़ल.का प्रयास है । दिली मुबारकबाद क़ुबूल करें । आली जनाब मोहतरम समर कबीर साहब की इस्लाह का संज्ञान लें ।

Comment by Samar kabeer on March 17, 2018 at 6:23pm

जनाब आमोद बिंदौरी जी आदाब,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है,लेकिन अभी आपको शिल्प पर बहुत मिहनत की ज़रूरत है,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।

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