For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

बेबस-स्वर

जीवन  के  अन्त  में

चित्त के  नेपथ्य  में

सृजन की थकन

बेहद उदास

मैं सोच रहा

तुम्हारा असीम विश्वास

आत्मा की तरुणाई

पलकें ... फिर भी अधूरी

आँसू  भीगे  अरमान

जो तुम्हारे पावन होंठों तक आकर

काँपते रहे

तू कह न सकी

मेरे स्वर भी खोखले-खोखले

साँझ के धुंधलके में

सुनाई  न  दिए

भयभीत, चुप हो गए

प्यार

तुम्हारी पलकों में अकुला रहा था

आँखें मेरी भी डबडबा रही थीं

मुझको प्यार और न दो

कैसे कह दूँ, प्रिय

इन अंतिम क्षणों में

प्यार तुम्हारा अब मुझसे

झेला नहीं जाता

शेष सब समाप्त

    ....उदास तुम 

         

           -----

 

 -- विजय निकोर

मौलिक व अप्रकाशित

Views: 79

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by vijay nikore on March 22, 2018 at 7:44am

सराहना के लिए आपका हार्दिक आभार, आदरणीय सुरेन्द्र जी।

Comment by सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' on March 22, 2018 at 6:01am

आद0 विजय निकोर जी सादर अभिवादन। अतुकांत में जो आप भाव शब्दो के माध्यम से पिरोते हैं,उसका जवाब नहीं। बेहतरीन भाव सम्प्रेषण के साथ लिखी गयी इस रचना पर कोटिश बधाइयाँ निवेदित है।सादर

Comment by vijay nikore on March 21, 2018 at 9:18am

सराहना के लिए आपका हार्दिक आभार, आदरणीय सुशील जी।

आपसे मिली सराहना से मनोबल बढ़ा।

Comment by Sushil Sarna on March 20, 2018 at 6:39pm

प्यार

तुम्हारी पलकों में अकुला रहा था

आँखें मेरी भी डबडबा रही थीं

मुझको प्यार और न दो

कैसे कह दूँ, प्रिय

इन अंतिम क्षणों में

प्यार तुम्हारा अब मुझसे

झेला नहीं जाता

शेष सब समाप्त

....उदास तुम

अनुपम और अप्रतिम सृजन सदा की तरह ... सागर से भावों का अवर्णीय प्रवाह ... दिल को दूर तक छूने वाली इस रचना के लिए दिल से बधाई सर।

Comment by vijay nikore on March 20, 2018 at 7:40am

सराहना के लिए आपका हार्दिक आभार, आदरणीय जनाब तस्दीक़ अहमद साहिब ।

Comment by vijay nikore on March 20, 2018 at 7:35am

सराहना के लिए आपका हार्दिक आभार, आदरणीय भाई समर जी। दूसरी पंक्ति में सुधार कर रहा हूँ, आपका हार्दिक आभार।

Comment by vijay nikore on March 20, 2018 at 7:31am

सराहना के लिए आपका हार्दिक आभार, आदरणीय शेख शहज़ाद उस्मानी जी।

Comment by Tasdiq Ahmed Khan on March 19, 2018 at 7:47pm

मुहतरम जनाब विजय साहिब , बहुत ही जज़्बाती और आकर्षक कविता हुई है ,मुबारक बाद क़ुबूल फरमाएं।

Comment by Samar kabeer on March 19, 2018 at 6:11pm

जनाब भाई विजय निकोर जी आदाब,बहुत उम्दा और शानदार कविता, सुंदर शब्दों के भीतर अथाह दर्द समेटे हुए,लाजवाब सृजन, दिल से ढेरों बधाई स्वीकार करें ।

दूसरी पंक्ति में शायद 'धुंधलके' की जगह "धुंधले" हो गया है,देख लें ।

Comment by Sheikh Shahzad Usmani on March 19, 2018 at 6:11am

बहुआयामी भाव लिए जीवन के सत्य और आध्यात्म के साथ अतृप्ति, असंतुष्टि और  बिछोह की नियति पर बेहतरीन सृजन। हार्दिक बधाई विजय निकोरे साहिब।

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity


सदस्य कार्यकारिणी
शिज्जु "शकूर" replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-94
"है सख़्त बर्फ़ मगर ये पिघल तो सकती हैतहों से इसकी नदी भी निकल तो सकती है ज़माने हो गए ख़ुर्शीद का किए…"
2 hours ago
anjali gupta replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-94
"किसी के दिल में भी चाहत मचल तो सकती है निगाह-ए-इश्क से शम्मा पिघल तो सकती है ये माना हो न…"
2 hours ago
Samar kabeer replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-94
"गर आप चाहें तबीअत बहल तो सकती है कोई मिलाप की सूरत निकल तो सकती है इसी यक़ीन पे कोई अमल नहीं…"
2 hours ago
Nilesh Shevgaonkar replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-94
"ख़फ़ा ख़फ़ा ही सही साथ चल तो सकती है ऐ ज़िन्दगी तू ये तेवर बदल तो सकती है. . उठी हुई है जो रिश्ते में…"
2 hours ago
Nilesh Shevgaonkar commented on Nilesh Shevgaonkar's blog post ग़ज़ल नूर की- बहुत आसाँ है दुनिया में किसी का प्यार पा लेना,
"धन्यवाद आ. श्याम जी "
3 hours ago
Nilesh Shevgaonkar commented on Nilesh Shevgaonkar's blog post ग़ज़ल नूर की- बहुत आसाँ है दुनिया में किसी का प्यार पा लेना,
"धन्यवाद आ. डॉ आशुतोष जी "
3 hours ago
TEJ VEER SINGH commented on TEJ VEER SINGH's blog post तन की बात - लघुकथा –
"हार्दिक आभार आदरणीय डॉ आशुतोष मिश्रा जी।"
9 hours ago
Shyam Narain Verma commented on Nilesh Shevgaonkar's blog post ग़ज़ल नूर की- बहुत आसाँ है दुनिया में किसी का प्यार पा लेना,
"बहुत खूबसूरत अशआर ...दिल से बधाई "
10 hours ago
Shyam Narain Verma commented on Sushil Sarna's blog post मोहब्बत ...
"बहुत सुन्दर ॥ अतुकांत रचना के लिये हार्दिक बधाइयाँ"
10 hours ago
Shyam Narain Verma commented on vijay nikore's blog post एक उखड़ा-दुखता रास्ता
"सुंदर रचना के लिए बहुत बधाई सादर"
10 hours ago
Sheikh Shahzad Usmani commented on vijay nikore's blog post एक उखड़ा-दुखता रास्ता
"दूर की विरहन/तड़प और नज़दीक़ की भी ! बेहतरीन सम्प्रेषण। हार्दिक बधाई आदरणीय विजय निकोरे साहिब।"
12 hours ago
Sheikh Shahzad Usmani commented on Sheikh Shahzad Usmani's blog post विचार-मंथन के सागर में (अतुकान्त कविता)
"मेरी इस ब्लॉग पोस्ट पर समय देकर अनुमोदन और हौसला अफ़ज़ाई के लिए तहे दिल से बहुत-बहुत शुक्रिया…"
12 hours ago

© 2018   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service