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बेबस-स्वर

जीवन  के  अन्त  में

चित्त के  नेपथ्य  में

सृजन की थकन

बेहद उदास

मैं सोच रहा

तुम्हारा असीम विश्वास

आत्मा की तरुणाई

पलकें ... फिर भी अधूरी

आँसू  भीगे  अरमान

जो तुम्हारे पावन होंठों तक आकर

काँपते रहे

तू कह न सकी

मेरे स्वर भी खोखले-खोखले

साँझ के धुंधलके में

सुनाई  न  दिए

भयभीत, चुप हो गए

प्यार

तुम्हारी पलकों में अकुला रहा था

आँखें मेरी भी डबडबा रही थीं

मुझको प्यार और न दो

कैसे कह दूँ, प्रिय

इन अंतिम क्षणों में

प्यार तुम्हारा अब मुझसे

झेला नहीं जाता

शेष सब समाप्त

    ....उदास तुम 

         

           -----

 

 -- विजय निकोर

मौलिक व अप्रकाशित

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Comment by vijay nikore on March 22, 2018 at 7:44am

सराहना के लिए आपका हार्दिक आभार, आदरणीय सुरेन्द्र जी।

Comment by सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' on March 22, 2018 at 6:01am

आद0 विजय निकोर जी सादर अभिवादन। अतुकांत में जो आप भाव शब्दो के माध्यम से पिरोते हैं,उसका जवाब नहीं। बेहतरीन भाव सम्प्रेषण के साथ लिखी गयी इस रचना पर कोटिश बधाइयाँ निवेदित है।सादर

Comment by vijay nikore on March 21, 2018 at 9:18am

सराहना के लिए आपका हार्दिक आभार, आदरणीय सुशील जी।

आपसे मिली सराहना से मनोबल बढ़ा।

Comment by Sushil Sarna on March 20, 2018 at 6:39pm

प्यार

तुम्हारी पलकों में अकुला रहा था

आँखें मेरी भी डबडबा रही थीं

मुझको प्यार और न दो

कैसे कह दूँ, प्रिय

इन अंतिम क्षणों में

प्यार तुम्हारा अब मुझसे

झेला नहीं जाता

शेष सब समाप्त

....उदास तुम

अनुपम और अप्रतिम सृजन सदा की तरह ... सागर से भावों का अवर्णीय प्रवाह ... दिल को दूर तक छूने वाली इस रचना के लिए दिल से बधाई सर।

Comment by vijay nikore on March 20, 2018 at 7:40am

सराहना के लिए आपका हार्दिक आभार, आदरणीय जनाब तस्दीक़ अहमद साहिब ।

Comment by vijay nikore on March 20, 2018 at 7:35am

सराहना के लिए आपका हार्दिक आभार, आदरणीय भाई समर जी। दूसरी पंक्ति में सुधार कर रहा हूँ, आपका हार्दिक आभार।

Comment by vijay nikore on March 20, 2018 at 7:31am

सराहना के लिए आपका हार्दिक आभार, आदरणीय शेख शहज़ाद उस्मानी जी।

Comment by Tasdiq Ahmed Khan on March 19, 2018 at 7:47pm

मुहतरम जनाब विजय साहिब , बहुत ही जज़्बाती और आकर्षक कविता हुई है ,मुबारक बाद क़ुबूल फरमाएं।

Comment by Samar kabeer on March 19, 2018 at 6:11pm

जनाब भाई विजय निकोर जी आदाब,बहुत उम्दा और शानदार कविता, सुंदर शब्दों के भीतर अथाह दर्द समेटे हुए,लाजवाब सृजन, दिल से ढेरों बधाई स्वीकार करें ।

दूसरी पंक्ति में शायद 'धुंधलके' की जगह "धुंधले" हो गया है,देख लें ।

Comment by Sheikh Shahzad Usmani on March 19, 2018 at 6:11am

बहुआयामी भाव लिए जीवन के सत्य और आध्यात्म के साथ अतृप्ति, असंतुष्टि और  बिछोह की नियति पर बेहतरीन सृजन। हार्दिक बधाई विजय निकोरे साहिब।

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