बेबस-स्वर
जीवन के अन्त में
चित्त के नेपथ्य में
सृजन की थकन
बेहद उदास
मैं सोच रहा
तुम्हारा असीम विश्वास
आत्मा की तरुणाई
पलकें ... फिर भी अधूरी
आँसू भीगे अरमान
जो तुम्हारे पावन होंठों तक आकर
काँपते रहे
तू कह न सकी
मेरे स्वर भी खोखले-खोखले
साँझ के धुंधलके में
सुनाई न दिए
भयभीत, चुप हो गए
प्यार
तुम्हारी पलकों में अकुला रहा था
आँखें मेरी भी डबडबा रही थीं
मुझको प्यार और न दो
कैसे कह दूँ, प्रिय
इन अंतिम क्षणों में
प्यार तुम्हारा अब मुझसे
झेला नहीं जाता
शेष सब समाप्त
....उदास तुम
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-- विजय निकोर
मौलिक व अप्रकाशित
Comment
सराहना के लिए आपका हार्दिक आभार, आदरणीय सुरेन्द्र जी।
आद0 विजय निकोर जी सादर अभिवादन। अतुकांत में जो आप भाव शब्दो के माध्यम से पिरोते हैं,उसका जवाब नहीं। बेहतरीन भाव सम्प्रेषण के साथ लिखी गयी इस रचना पर कोटिश बधाइयाँ निवेदित है।सादर
सराहना के लिए आपका हार्दिक आभार, आदरणीय सुशील जी।
आपसे मिली सराहना से मनोबल बढ़ा।
प्यार
तुम्हारी पलकों में अकुला रहा था
आँखें मेरी भी डबडबा रही थीं
मुझको प्यार और न दो
कैसे कह दूँ, प्रिय
इन अंतिम क्षणों में
प्यार तुम्हारा अब मुझसे
झेला नहीं जाता
शेष सब समाप्त
....उदास तुम
अनुपम और अप्रतिम सृजन सदा की तरह ... सागर से भावों का अवर्णीय प्रवाह ... दिल को दूर तक छूने वाली इस रचना के लिए दिल से बधाई सर।
सराहना के लिए आपका हार्दिक आभार, आदरणीय जनाब तस्दीक़ अहमद साहिब ।
सराहना के लिए आपका हार्दिक आभार, आदरणीय भाई समर जी। दूसरी पंक्ति में सुधार कर रहा हूँ, आपका हार्दिक आभार।
सराहना के लिए आपका हार्दिक आभार, आदरणीय शेख शहज़ाद उस्मानी जी।
मुहतरम जनाब विजय साहिब , बहुत ही जज़्बाती और आकर्षक कविता हुई है ,मुबारक बाद क़ुबूल फरमाएं।
जनाब भाई विजय निकोर जी आदाब,बहुत उम्दा और शानदार कविता, सुंदर शब्दों के भीतर अथाह दर्द समेटे हुए,लाजवाब सृजन, दिल से ढेरों बधाई स्वीकार करें ।
दूसरी पंक्ति में शायद 'धुंधलके' की जगह "धुंधले" हो गया है,देख लें ।
बहुआयामी भाव लिए जीवन के सत्य और आध्यात्म के साथ अतृप्ति, असंतुष्टि और बिछोह की नियति पर बेहतरीन सृजन। हार्दिक बधाई विजय निकोरे साहिब।
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