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किसने किया तुझसे मना-गजल

२२१२ २२१२ 

किसने किया तुझसे मना

कर प्रेम की आराधना

 

चारों तरफ ही प्रेम की

मौजूद है सम्भावना

 

हों झुर्रियाँ जिस हाथ में

मौका मिले तो थामना

 

करना किसी की भी नहीं

बिन बात के आलोचना  

 

माहौल है, अब कलयुगी

होती न सच की साधना

 

कोई हँसे फुटपाथ पर

कोई महल में अनमना

 

आसान कब है जिदंगी

है मुश्किलों से सामना

"मौलिक एवं अप्रकाशित" 

@ बसंत कुमार शर्मा, जबलपुर

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Comment by बसंत कुमार शर्मा on March 26, 2018 at 8:59pm

आदरणीय सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप'  जी ह्रदय से आभार आदरणीय आपका 

Comment by बसंत कुमार शर्मा on March 26, 2018 at 8:58pm

आदरणीय समर कबीर जी आपके बहुमूल्य सुझाव का तहे दिल से शुक्रिया , मैंने सुधार कर लिए है 

Comment by नाथ सोनांचली on March 26, 2018 at 8:15pm

आद0 बसन्त जी बेहतरीन ग़ज़ल के लिए दिली मुबारकबाद कुबूल फरमाएं

Comment by Samar kabeer on March 25, 2018 at 9:56pm

जनाब बसंत कुमार शर्मा जी आदाब,ग़ज़ल अच्छी लगी,बधाई स्वीकार करें ।

मतले के ऊला मिसरे में 'तुझसे' की जगह "तुझको" करना उचित होगा ।

Comment by बसंत कुमार शर्मा on March 25, 2018 at 7:54pm

आदरणीय  लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' जी आपका बहुत बहुत धन्यवाद 

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on March 25, 2018 at 5:15pm

आ. भाई बसंत जी, बेहतरीन गजल हुई है । हार्दिक बधाई ।

Comment by बसंत कुमार शर्मा on March 25, 2018 at 11:55am

आदरणीय Harash Mahajan जी आपका दिल से शुक्रिया 

Comment by बसंत कुमार शर्मा on March 25, 2018 at 11:55am

आदरणीय Ajay Tiwari  जी आपका दिल से शुक्रिया 

Comment by बसंत कुमार शर्मा on March 25, 2018 at 11:51am

आदरणीय बृजेश कुमार 'ब्रज' जी ह्रदय से आभार आपका 

Comment by बसंत कुमार शर्मा on March 25, 2018 at 11:50am

 आदरणीय Nilesh Shevgaonkar जी आपकी प्रेरक प्रतिक्रिया एवं सुझाव का ह्रदय से आभार, सुधार लेता हूँ. 

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