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राम सरीखे बन पाये क्या-गीत

कब निकले बाहर महलों से,

वन में गीत कभी गाये क्या

पूजा करते रहे राम की,

राम सरीखे बन पाये क्या

 

भाई को कब भाई समझा,

हर विपदा में किया किनारा

दीवारों पर दीवारें चिन,

करते रहे रोज बटवारा.

 

चरण पादुका पाने उनकी,

आतुर होकर धाये क्या.

 

छुआछूत का रोग मिटाने,

चर्चाएँ तो हुईं बहुत सी

मगर शिलाएँ पड़ी हुईं हैं

जंगल में अनछुईं बहुत सी

 

झूठे बेर कभी शबरी के,

वन में जाकर खाए क्या

 

पाले-पोषे हैं खरदूषण,

रावण का संहार किया कब

राम राज्य बस रही कल्पना,

सपना यह साकार किया कब

 

त्याग तपस्या की इक मूरत,

खुद को कभी बनाये क्या.

"मौलिक एवं अप्रकाशित "

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Comment by बसंत कुमार शर्मा on March 26, 2018 at 9:01pm

आदरणीय   लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'  जी आपका दिल से शुक्रिया 

Comment by बसंत कुमार शर्मा on March 26, 2018 at 9:00pm

आदरणीय  TEJ VEER SINGH जी आपका दिल से शुक्रिया 

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on March 26, 2018 at 8:49pm

आ. भाई बसंत जी, सुंदर रचना हुई है । हार्दिक बधाई ।

Comment by TEJ VEER SINGH on March 26, 2018 at 8:07pm

बेहतरीन कविता आदरणीय बसंत कुमार जी। हार्दिक बधाई।

Comment by बसंत कुमार शर्मा on March 26, 2018 at 1:07pm

आदरणीय  समर कबीर जी दिल से शुक्रिया आपका 

Comment by बसंत कुमार शर्मा on March 26, 2018 at 1:07pm

आदरणीय  बृजेश कुमार 'ब्रज' जी दिल से शुक्रिया आपका 

Comment by Samar kabeer on March 26, 2018 at 12:26pm

जनाब बसंत कुमार शर्मा जी,सुंदर प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on March 26, 2018 at 11:07am

उत्तम बहुत ही उत्तम भाव रचना..बहुत बहुत बधाई आदरणीय

Comment by बसंत कुमार शर्मा on March 25, 2018 at 8:04pm

परिमार्जन उपरांत, पुनः प्रस्तुत  

कब निकले बाहर महलों से,

वन में गीत कभी गाये क्या ?

पूजा करते रहे राम की,

राम सरीखे बन पाये क्या ?

 

भाई को कब भाई समझा,

हर विपदा में किया किनारा

दीवारों पर दीवारें चिन,

करते रहे रोज बटवारा.

 

चरण पादुका पाने उनकी,

तुम आतुर होकर धाये क्या ?

 

पाले-पोषे हैं खरदूषण,

रावण का संहार किया कब

राम राज्य बस रही कल्पना,

सपना यह साकार किया कब

 

त्याग तपस्या की इक मूरत,

खुद को भी कभी बनाये क्या ?

 

छुआछूत का रोग मिटाने,

चर्चाएँ तो हुईं बहुत सी

मगर शिलाएँ पड़ी हुईं हैं

जंगल में अनछुईं बहुत सी

 

झूठे बेर कभी शबरी के,

वन में घर जाकर खाए क्या ?

Comment by बसंत कुमार शर्मा on March 25, 2018 at 7:58pm

आदरणीय somesh kumar जी आपका दिल से शुक्रिया 

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