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यथार्थ ....

कुछ पीले थे
कुछ क्षत-विक्षत थे
कुछ अपने शैशव काल में थे
फिर भी उनका 
शाखाओं का साथ छूट गया


धरा पर पड़े
इन पत्तों की बेबसी पर
हवा कहकहे लगा रही थी


जिसके फैले बाज़ुओं पर
निश्चिंत रहा करते थे
उम्र के पड़ाव पर
उन्हीं बाजुओं से
साथ छूटता चला गया


अब उनका बाबा
एक कंकाल मात्र ही तो था
पीले पत्ते बात को समझते थे
कभी -कभी हवा के बहकावे में
इधर -उधर हो जाते थे
लेकिन शैशवकाल के पत्ते
ज़मीन पर तने के साथ लिपटे थे
हवा के वेग से डरे थे
बाबा बेबस था
अपने निस्तेज शरीर से
वो अपनी बाजुओं से गिरे पत्तों की
कोई सहायता
नहीं कर पा रहा था


अचानक
एक कुल्हाड़ा चला
वो
बूढ़ा वृक्ष
उनका बाबा
धड़ाम से गिर पड़ा
पीले सूखे पत्ते
शैशवकाल के पत्ते
ज़माने के क़दमों तले
रौंदे गए पत्ते
सब के सब
एक स्वर में चीख पड़े
बा....बा
बा........बा
बा..............बा
मगर
बाबा जा चुके थे
हाँ,लेकिन
जाते -जाते एक यथार्थ से
परिचय करवा गए
कि
जीवन में
बड़ों का
क्या
महत्त्व होता है

सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

Views: 457

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Comment by Sushil Sarna on April 7, 2018 at 2:20pm

आदरणीय विजय निकोर साहिब , सादर प्रणाम ... सृजन के भावों को आत्मीय मान देने का दिल से आभार।

Comment by Sushil Sarna on April 7, 2018 at 2:20pm

आदरणीय लक्ष्मण धामी जी सृजन के भावों को मान देने का दिल से शुक्रिया।

Comment by Sushil Sarna on April 7, 2018 at 2:19pm


आदरणीय समर कबीर साहिब, आदाब सृजन के भावों की गहनता को आत्मीय स्वीकृति देती आपकी अनमोल प्रशंसा का दिल से शुक्रिया।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on April 5, 2018 at 10:59am

बहुत खूब... हार्दिक बधाई ..

Comment by Samar kabeer on April 4, 2018 at 9:39pm

जनाब सुशील सरना जी आदाब,भाई मज़ा आ गया आपकी कविता पढ़कर,इशारों इशारों में कितनी गहरी बात कह दी आपने,वाह बहुत ख़ूब, दिल खोल कर दाद लीजिये,इस शानदार प्रस्तुति पर ।

Comment by Sushil Sarna on April 4, 2018 at 4:26pm

आदरणीय  Shyam Narain Verma जी सृजन के भावों को मान देने का दिल से आभार।

Comment by Shyam Narain Verma on April 4, 2018 at 1:13pm
अच्छी प्रस्तुति आदरणीय ,बधाई 

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