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अन्याय के विरोध में जाने से डर लगा ।।

भारत का संविधान बताने से डर लगा ।।

यूँ ही बिखर न जाये कहीं मुल्क आपका ।

कोटे पे आज बात चलाने से डर लगा ।।

घोला है ज़ह्र अपने गुलशन में इस तरह ।

अब जिंदगी को और बचाने से डर लगा ।।

फर्जी रपट लिखा के वो अंदर करा गया ।

मैं बे गुनाह था ये बताने से डर लगा ।।

शोषित हुआ सवर्ण करे भी तो क्या करे ।

उसको तो अपना ज़ख्म दिखाने से डर लगा ।।

कैसी स्वतन्त्रता है ये आजाद मुल्क की ।

अब लोकतंत्र देश में लाने से डर लगा ।।

जो छीनता है रोटियां बच्चों के हाथ से ।

ऐसे वतन पे जान लुटाने से डर लगा ।।

लाचार कर दिया है सियासत की मार ने।

मुझको तो अपनी जात लिखाने से डर लगा ।।

जो राष्ट्र द्रोह कर रहे भारत को बंद कर ।

गुंडो से कत्ले आम कराने से डर लगा ।।

नामो निशां मिटाने की हसरत लिए हैं वे ।

उनसे तो आज हाथ मिलाने से डर लगा ।।

ठग कर गयी है खूब ये जम्हूरियत मुझे ।

अपना यहां वजूद बचाने से डर लगा ।।

-- नवीन मणि त्रिपाठी

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Comment

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Comment by Naveen Mani Tripathi on April 10, 2018 at 1:17am

भाई डॉ आशुतोष नारायण मिश्र जी सप्रेम आभार । टाइप में त्रुटि है बन्धु ।

Comment by Dr Ashutosh Mishra on April 9, 2018 at 4:02pm

घोला है ज़ह्र अपने गुलशन में इस तरह ।अपने की जगह शायद आपने होगा बह्र की दृष्टि से 

आदरणीय ..इस रचना पर हार्दिक शुभकामनाएं सादर 

Comment by Naveen Mani Tripathi on April 8, 2018 at 3:49pm

आ0 श्याम नरायण वर्मा जी हार्दिक आभार ।

Comment by Naveen Mani Tripathi on April 8, 2018 at 3:48pm

आ0 समर कबीर सर सादर नमन के साथ हार्दिक आभार 

Comment by Naveen Mani Tripathi on April 8, 2018 at 3:47pm

आ0 सुशील सरन जी सादर आभार ।

Comment by Shyam Narain Verma on April 7, 2018 at 3:20pm
वाह ! बहुत खूब | सुन्दर प्रस्तुति के लिए हार्दिक बधाई | सादर 
Comment by Samar kabeer on April 7, 2018 at 2:44pm

जनाब नवीन मणि त्रिपाठी जी आदाब,अच्छी ग़ज़ल हुई है,बधाई स्वीकार करें ।

Comment by Sushil Sarna on April 7, 2018 at 2:30pm

अन्याय के विरोध में जाने से डर लगा ।।

भारत का संविधान बताने से डर लगा ।।

यूँ ही बिखर न जाये कहीं मुल्क आपका ।

कोटे पे आज बात चलाने से डर लगा ।।

बहुत उम्दा आदरणीय नवीन मणि जी। .... आज के सन्दर्भ की जीवंत व्याख्या। हार्दिक बधाई स्वीकार करें सर।

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