आलमे खयाल
(अतुकांत)
शाम बैठी रही हो कर तैयार वह दुलहन-सी
उदास.. मुन्तज़िर थी वह आज भी इश्क की
ज़रूर निराला ही होगा यह आलमे तसव्वुर
दर पर हाँ एक हल्की-सी दस्तक तो हुई थी
पर वह जो आया था दर पर वह इश्क न था
फ़कत आलमे फ़ना था .. हवा का झोंका था
उसका क्या ? आया, फ़ना कर के चला गया
आदतन किसी और दरवाज़े पर दस्तक देने
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-- विजय निकोर
(मौलिक व अप्रकाशित)
आलमे खयाल = कल्पना जगत
आलमे तसव्वुर = गूढ़ ध्यान का संसार
आलमे फ़ना =नश्वर जगत
Comment
सराहना के लिए आपका हार्दिक आभार, आदरणीय सुरेन्द्र जी।
सराहना के लिए आपका हार्दिक आभार, आदरणीय लक्ष्मण जी।
सराहना के लिए आपका हार्दिक आभार, आदरणीय शेख़ शहजाद उस्मानी साहब। आपसे मिला मान बहुमान्य है।
आद0 विजय निकोर जी सादर नमन। बढिया कविता कही आपने, बधाई स्वीकार कीजिये
आ. भाई विजय जी, सुंदर रचना हुई है । हार्दिक बधाई ।
वाह। // आलमे फ़ना . .. हवा का झोंका // बेहतरीन सृजन के लिए हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं आदरणीय विजय निकोरे साहिब। शब्दार्थ के लिए हार्दिक आभार।
आदरणीय भाई समर जी, आदाब।
आपका सुझाव बहुत अच्छा लगा, और संशोधन कर दिया है।
मैं उर्दु कविता लिखने में अभी नया हूँ, लेकिन शीघ्र सीखने की कोहिश कर रहा हूँ।
कृपया मार्ग-दर्श्न करते रहें। सराहना के लिए आपका हार्दिक आभार।
मेरे कहे को मान देने के लिए धन्यवाद ।
सराहना के लिए आपका हार्दिक आभार, आदरणीय मोहम्मद आरिफ़ भाई। संशोधन कर दिया है।
आदरणीय विजय निकोर जी आदाब,
अपनी परंपरागत शैली से अलग हटकर रचना पेश की आपने । बड़ी ख़ुशी की बात है । रचनाकार में खिलंदड़पन होना आवश्यक है । हार्दिक बधाई स्वीकार करें । आली जनाब मोहतरम समर कबीर साहब की इस्लाह का संज्ञान लें ।
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