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चंद हायकू ....

आँखों की भाषा
अतृप्त अभिलाषा
सूनी चादर

सूनी आँखें
वेदना का सागर
बहते आंसू

साँसों की माया
मरघट की छाया
जर्जर काया

टूटे बंधन
देह अभिनन्दन
व्यर्थ क्रंदन

बाहों का घेरा
विलय का मंज़र
चुप अँधेरा

सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

Views: 478

Comment

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Comment by Sushil Sarna on April 10, 2018 at 7:49pm

आदरणीय  बृजेश कुमार 'ब्रज' जी ... सृजन के भावों को आत्मीय मान देने का दिल से आभार। 

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on April 8, 2018 at 9:32pm

बहुत ही उम्दा हाइकु हुए आदरणीय...सादर

Comment by Sushil Sarna on April 8, 2018 at 4:01pm

आदरणीय narendrasinh chauhan जी ... सृजन के भावों को आत्मीय मान देने का दिल से आभार। 

Comment by narendrasinh chauhan on April 8, 2018 at 2:12pm
सु.दर रचना
Comment by Sushil Sarna on April 7, 2018 at 8:47pm

आदरणीय समर कबीर साहिब, आदाब सृजन के भावों की गहनता को आत्मीय स्वीकृति देती आपकी अनमोल प्रशंसा का दिल से शुक्रिया। 

Comment by Samar kabeer on April 7, 2018 at 2:20pm

जनाब सुशील सरना जी आदाब,बहुत उम्दा हाइकू हुए हैं,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।

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