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2122 1212 22

जाम छलका है पास आ जाओ ।

ले के खाली गिलास आ जाओ ।।

जिंदगी फिर बुला रही है तुझे ।

लब पे आई है प्यास आ जाओ ।।

हिज्र के बाद चैन मिलता कब ।

मन अगर है उदास आ जाओ ।।

तीरगी बेहिसाब कायम है ।

चाहिए अब उजास आ जाओ ।।

कोई बैठा है मुन्तजिर होकर ।

मत लगाओ कयास आ जाओ ।।

आ रहे हैं तमाम भौरे अब ।

गंध में है मिठास आ जाओ ।।

देखना है अगर तुम्हें जन्नत ।

तुम हमारे निवास आ जाओ ।।

बारिशें बेसबब नहीं होतीं ।

आज भीगा लिबास आ जाओ ।।

इस तरह बेनकाब मत निकलो ।

गैर को तुम न रास आ जाओ ।।

बात इतनी सी और कहनी थी ।

इक पुरानी है आस आ जाओ ।।

-- नवीन मणि त्रिपाठी

मौलिक अप्रकाशित

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Comment by Harash Mahajan on April 14, 2018 at 11:28am

वाह आदरणीय मनी जी बहुत खूब ।

दिली दाद आपकी इस खूबसूरत ग़ज़ल पर ।

सादर

Comment by Naveen Mani Tripathi on April 13, 2018 at 10:00am

आ0 तस्दीक़ अहमद साहब शुक्रिया ।

Comment by Tasdiq Ahmed Khan on April 13, 2018 at 9:22am

जनाब नवीन मणि साहिब ,सुन्दर ग़ज़ल हुई है ,मुबारक बाद क़ुबूल फरमायें।

Comment by Naveen Mani Tripathi on April 12, 2018 at 10:24pm

आ0 श्याम नरायण वर्मा जी हार्दिक आभार

Comment by Naveen Mani Tripathi on April 12, 2018 at 10:23pm

आ0 कबीर सर सादर नमन के साथ हार्दिक आभार ।

Comment by Samar kabeer on April 12, 2018 at 6:27pm

जनाब नवीन जी आदाब,अच्छी ग़ज़ल हुई है,बधाई स्वीकार करें ।

Comment by Shyam Narain Verma on April 12, 2018 at 10:42am
बहुत खूब ॥ आपको हार्दिक बधाइयाँ ॥

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